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कपड़ा उद्योग में 15 लाख से ज्यादा अन्य राज्यों से

सूरत के सर्वांगीण विकास में परप्रांतियों का महत्वपूर्ण योगदान पीढिय़ों से सूरत में बसे, अर्थव्यवस्था में रीढ़ हैं
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सूरत

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Pradeep Devmani Mishra

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Updated: 8 Oct 2018, 9:05 PM IST

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कपड़ा उद्योग में 15 लाख से ज्यादा अन्य राज्यों से

सूरत

गुजरात की आर्थिक नगरी कहे जाने वाले सूरत शहर के विकास में परप्रांतियों का महत्वपूर्ण योगदान है। सूरत की अर्थव्यवस्था में रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले कपड़ा और हीरा उद्योग में 15 लाख से अधिक श्रमिक अन्य राज्यों के कार्यरत हैं। इन श्रमिकों के बिना सूरत में उद्योग का विकास बेमानी है। सूरत शहर ने भी अन्य राज्यों से आने वाले परप्रांतियों को बिना भेदभाव के समाहित कर लिया है। अन्य राज्यों से आने वाले सभी लोगों ने सूरत को अपनी कर्मभूमि बना लिया है और कइयों की तो तीन-चार पीढिय़ां भी यहां हो चुकी हंै।
सूरत के कपड़ा उद्योग में लगभग छह लाख लूम्स मशीनें, 350 डाइंग प्रोसेसिंग यूनिट, 1 लाख एम्ब्रॉयडरी यूनिट हैं। यहां पर 12 घंटे तक कारखानों में काम होता है। दिवाली एवं अन्य त्योहारों के दौरान अन्य राज्यों के श्रमिक वतन जाते हैं तब उत्पादन पर असर दिखने लगता है। सूरत के कपड़ा उद्योग का वार्षिक टर्नओवर करीब 60 हजार करोड़ रुपए है। सूरत को दुनिया में सिल्कसिटी के नाम से जाना जाता है। सूरत को यह पहचान दिलाने में उत्तरप्रदेश, बिहार, ओडिशा. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों से आए श्रमिकों का बड़ा योगदान है। कपड़ा बाजार में रिंगरोड, सारोल सहित अन्य क्षेत्रों में फैले मार्केट में भी कटिंग-पैकिंग से लेकर अकाउन्टेन्ट, पार्सल पैक करने और हमाली से लेकर टैम्पो ड्राइवर तक का काम परप्रांतीय श्रमिक करते हैं। कपड़ा मार्केट में काम करने वाले श्रमिकों में उत्तर भारत के लोगों की संख्या ज्यादा है। कपड़ा मार्केट की चमक में परप्रांतियों का खून-पसीना भी मिला है। हीरा उद्योग में उत्तर गुजरात के लोगों की संख्या विशेष है, लेकिन यहां भी यू.पी, बिहार, उत्तराखंड आदि राज्यों के लोगों ने अपनी मेहनत का रंग बिखेरा है। हीरा उद्योग में भी अन्य राज्यों के श्रमिक अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। उत्तर भारत के श्रमिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सूरत में हीरा उद्योग को चमकाने का प्रयास कर रहे हैं।

सूरत का कपड़ा उद्योग एक नजर:
छह लाख लूम्स मशीनें
350 डाइंग प्रोसेसिंग यूनिट
1 लाख एम्ब्रॉयडरी यूनिट
वार्षिक टर्नओवर 60 हजार करोड़ रुपए

सूरत के विकास में परप्रांतियों का योगदान

सूरत का विकास यहां के उद्योगों के कारण हैं और उद्योगों में काम करने वाले अधिकांश श्रमिक अन्य राज्यों के हैं। उत्तर गुजरात में हो रही घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। किसी एक व्यक्ति की गलती की सजा पूरे समाज को दी जाए, यह गलत है। गुजरात में आकर बसे परप्रांतियों ने हमेशा गुजरात को अपना समझा और विकास के लिए हर प्रयास किया है।
बृजमोहन अग्रवाल, कपड़ा व्यापारी

दूध में शक्कर के समान हैं

रोजी-रोटी की तलाश में सूरत आए परप्रांतीय सूरत में दूध में शक्कर के समान घुल गए हैं। सूरत ने उन्हेंं काम करने का मौका दिया तो उन्होंने सूरत को अपने खून-पसीने से चमका दिया। यहां के उद्योगों में परप्रांतियों के योगदान का भुलाया नहीं जा सकता। किसी एक की गलती की सजा सबको देना गलत है।
योगेन्द्र डांगे, व्यापारी

सूरत को अपना समझकर किया काम
सूरत में यूपी, बिहार के लगभग 10 लाख से अधिक लोग काम करते हैं। उन्होंने सूरत को अपना समझकर ही काम किया है। सूरत के विकास में उनका रोल महत्वपूर्ण रहा है। अन्य राज्यों से आए लोगों ने व्यापार उद्योग में पूरी लगन से काम किया है। सूरत और गुजरात के विकास में उनका योगदान महत्वपूर्ण है।
सावरप्रसाद बुधिया, प्रमुख, साउथ गुजरात टैक्सटाइल ट्रेडर एसोसिएशन

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