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NAVRATRI : कोरोना के दो साल बाद फिर ‘गरबा’ व्यवसाय ने पकड़ा जोर

नवरात्र NAVRATRI में देवीमां को प्रसन्न करने के लिए गरबा स्थापना कर उसके आसपास गरबा किया जाता है। पिछले दो साल से ठप पड़े मिटत के गरबे के व्यवसाय को इस साल नवजीवन मिल गया। गरबा मटकियां बनाकर उन्हें सजाकर बेचने वालों को इस साल बड़े-बड़े ऑर्डर मिले हैं। इनको पूरा करने के लिए विक्रेताओं ने 4 माह पहले से तैयारियां शुरू कर दी थी। इस साल सूरत समेत आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर 10 लाख से अधिक गरबे की बिक्री का अंदाजा लगाया जा रहा है। इतने गरबे बिकने पर करीब 100 करोड़ का व्यापार होने की उम्मीद है।

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NAVRATRI : कोरोना के दो साल बाद फिर 'गरबा' व्यवसाय ने पकड़ा जोर

NAVRATRI : कोरोना के दो साल बाद फिर 'गरबा' व्यवसाय ने पकड़ा जोर

गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और एमपी से भी मिले ऑर्डर:
कोरोना के कारण पिछले दो साल से नवरात्रि NAVRATRI के पर्व पर भी ग्रहण लग गया था। इस वजह से मिट्टी के गरबा बनाने वाले परिवार पर आर्थिक संकट छा गया था। इस साल सारी पाबंदी हट जाने के चलते मिट्टी के गरबा बनाने वाले व्यवसाय को जीवन मिल गया है। गरबा बनाने वाले परिवारों को इस बार बड़े ऑर्डर मिले हैं। सूरत में कई गरबा बनाने वाले परिवार हैं। ऑर्डर को पूरा करने के लिए बड़े व्यापारियों ने कई छोटे व्यापारियों को ऑर्डर दिए। सूरत में तैयार किए जाने वाले गरबा को सूरत के साथ दक्षिण गुजरात, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्यप्रदेश में बिक्री के लिए भेजे जा रहे हैं। इस व्यापार से जुड़े सभी लोग इस साल को मिले ऑर्डर से काफी खुश हैं।

- मिट्टी के गरबा का महत्त्व :
गरबा का संस्कृत नाम गर्भ-द्वीप है। देवी की आर्धना आरंभ करने से पहले उनके निकट छिद्र वाले कच्चे घड़े को फूलों से सजा कर उसमें दीपक रखा जाता है। इसे दीपगर्भ या गर्भदीप कहते हैं। इसके नाम में कई बदलाव हुए और अंत में यह ‘गरबा’ कहलाया जाने लगा। नवरात्रि NAVRATRI की पहली रात गरबा की स्थापना कर उसमें ज्योति प्रज्वलित की जाती है। महिलाएं इसके चारों ओर आराधना करते हुए फेरे लगाती हैं। देवी को प्रसन्न करने के लिए किए जाने वाले इस नृत्य का नाम भी गरबा जाना जाने लगा। इसलिए गरबा खेलने से पहले मिट्टी के गरबे की स्थापना जरूरी है।
- 100 से 500 रूपए का बिकता है गरबा :
होलसेल मार्केट में एक गरबे की कीमत 100 रुपए है। इसके बाद इसे सजाने के लिए इसमें छिद्र किए जाते हैं। फिर इसे तरह तरह के रंगों से रंगा जाता है। रंग लग जाने के बाद इसे फूलों और अन्य चीजों से सजाकर आकर्षक बनाया जाता है। इस पर व्यापारी अतिरिक्त खर्च करते है। इसलिए बाजार में आते आते इसकी कीमत 200 से 500 रुपए तक हो जाती है।
- मिट्टी, रंग और सजावट के समान वालों को भी लाभ :
गरबा बनाने के लिए आवश्यक है मिट्टी। इसलिए मिट्टी बेचने वालों को सबसे पहले ऑर्डर मिला। गरबे को सजाने के लिए बड़े पैमाने पर रंगों और अन्य सामान वालो को भी ऑर्डर दिया गया। जिससे इनके व्यापार को गति मिली।
- ऑर्डर पूरा करने के लिए दिन-रात किया काम :
पिछले दो साल सारे व्यापारी आर्थिक समस्या से जूझ रहे थे। इस साल सभी के पास अच्छे ऑर्डर हैं। ऑर्डर पूरा करने के लिए कई छोटे व्यापारियों को भी काम सौंपा गया। सभी परिवार ऑर्डर पूरा करने में जुट गए। पिछले 4 माह से दिन रात काम किया है।
- मुनाफ माटलावाला, गरबा विक्रेता