
‘मोदी नेहरू जैकेट’
गणपत भंसाली. सूरत. सिल्कसिटी के टैक्सटाइल उद्योग की विश्व स्तर पर पहचान वैसे तो साड़ी, सलवार-कमीज, कुर्ती जैसे महिला उपयोगी फेब्रिक्स की उत्पादक मंडी के रूप में है। अब सूरत का साड़ी बाजार पुरुष उपयोगी फेब्रिक्स व रेडिमेड गारमेंट्स के उत्पादन में भी कदम बढ़ाता नजर आ रहा है। विशेषकर यहां कुछ हटकर करने वाले उद्योगपतियों ने नेहरू जैकेट, जो अब थोड़े बदलाव के बाद मोदी कोटी के रूप में प्रसिद्ध हो रही है, को बनाने की शुरुआत की है। कोटी के साथ-साथ कुर्ता-पायजामा, ब्लेजर व जोधपुरी बंद गले के कोट आदि भी बनाए जा रहे हैं। कोटी व कुर्ता-पायजामा उत्पादन के क्षेत्र में दस वर्ष पूर्व प्रवेश करने वाले सुरेश खण्डेलवाल ने बताया कि अभी सूरत में कोटी उद्योग के फलने-फूलने की गुंजाइश है। इसका कारण यहां कोटी के उपयोग में आने वाला फेब्रिक्स आसानी से उपलब्ध हो जाता है। सूरत में अब रेपियर्स तथा वॉटर जेट जैसे आधुनिक तकनीक के लूम्स काफी तादाद में हैं। इन लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के लूम्स पर हर किस्म का सिंथेटिक एवं कॉटन फेब्रिक्स आसानी से बुना जा सकता है। ऊपर से शिफली जैसी एम्ब्रॉयडरी मशीनें तथा नवीनतम टेक्नोलॉजी की डिजिटल प्रिंटिंग मशीनों के सूरत में बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाने से सूरत में सिंथेटिक आधारित किसी भी तरह के फेब्रिक्स का उत्पादन यहां के उद्यमियों के लिए आसान राह साबित हो रही है। गुजरात टेक्निकल यूनिवर्सिटी से टेक्सटाइल्स टेक्नोलॉजी में बी.टेक कर महज छह माह पूर्व एक स्पेशल ब्रांड से मोदी कोटी बनाने की शुरुआत करने वाले युवा आशीष व अशोक सिंघल ने बताया कि जो परिदृश्य दिखाई दे रहा है, उससे विदित होता है कि सूरत सिंथेटिक मोदी जैकेट का हब बन कर उभर सकता है। फिलहाल सिंघल प्रतिमाह ढाई से तीन हजार कोटी बना रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि 40-50 वर्ष पूर्व सामान्य तौर पर पहने जाने वाली 'बंडी' को उस दौर में ‘नेहरू जैकेट’ कहा जाने लगा और समय के बदलाव के साथ अब यह ‘मोदी कोटी’ के रूप में चर्चित हो गई।
विदेश में भी मोदी जैकेट की मांग
मोदी कोटी (जैकेट) को अब युवाओं ने भी शौक से अपनाया है। अग्रणी निर्यातक प्रकाश मेहता जैकेट का उत्पादन बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। वे इसके साथ शेरवानी व ब्लेजर्स भी बड़ी मात्रा में बना रहे हैं। मेहता ने बताया कि उनके यहां1400 से 3900 रुपए प्रति नग की रेंज उत्पादित होती हैं। उनके उत्पाद लंदन व कनाडा में निर्यात किए जा रहे हैं। विशेष यह भी है कि लंदन व कनाडा में रह रहे पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) के मुस्लिम ये कोटियां व शेरवानियां बड़ी तादाद में खरीदते हैं। वे कोटी को पठानी के ऊपर पहनते हैं। मेहता का कहना है कि दुनियाभर में जहां भी भारतीय बसे हुए हैं, वहां ये कोटियां पसन्द की जा रही है।
संस्थाओं में ड्रेस कोड से बढ़ी बिक्र ी
कोटी की बिक्री बढऩे का एक कारण यह भी है कि अब इसे धार्मिक, सामाजिक, व्यवसायिक, सभा-संस्थाओं और एसोसिएशनों में ड्रेस कोड के रूप में पहना जाने लगा है। इस कारण संगठन एक साथ 150-200 जैकेट एक रंग, एक डिजाइन में ड्रेसकोड के लिए खरीदते हैं। देशभर में लाखों संगठन है। महावीर इंटरनेशनल, लायन्स क्लब, रोटरी क्लब, जेसीआई, जैन सोशल ग्रुप आदि अनेक संगठनों के सदस्य कोटी को ड्रेस कोड के रूप में पहनते हैं।
गत लोकसभा चुनावों में कोटी के ब्रांड निर्माता सुरेश खण्डेलवाल के यहां से केसरिया रंग की कमल के निशान व नरेंद्र मोदी के फोटो वाली कोटी बड़ी मात्रा में चालान की गई थी। संसद भवन व विधानसभा भवनों में 60 से 70 प्रतिशत सांसद व विधायक मोदी कोटी पहने नजर आते हैं। सिर्फ दक्षिण भारतीय सांसद और विधायक इस पहनावे को कम पसन्द करते हैं। मेहता ने बताया कि वे 180 रंगों व डिजाइनों में कोटियां बना रहे हैं और इन कोटियों की सिलाई के लिए टेलर भी नवाबों की नगरी लखनऊ से बुलाए गए हैं। शेरवानियों की सिलाई वैसे भी लखनऊ की मशहूर है।
प्लेन व प्रिंट जूट, कॉटन, लिनेन की भी कोटी
एक खास ब्रांड की कोटी के उत्पादक आशीष एवं अशोक सिंघल ने बताया कि सूरत में कोटियां कॉटन, पॉलीस्टर, पॉलीस्टर-विस्कॉस, पॉलीस्टर कॉटन, चांपा सिल्क, प्योर सिल्क, फ्लेक, रेमिज, जूट, जेकोर्ड व निटिंग में तैयार की जाती हैं। आशीष के अनुसार इन दिनों स्प्रे प्रिंट की डिजाइनें भी पसन्द की जा रही हंै। फ्लोरेसेंट डिजाइनों में भी ये कोटियां बिक रही हैं।
आशीष बताते है कि उन्होंने छह माह पहले ही कोटियां तैयार कर बेचने का निर्णय लिया। इन छह महीनों में उन्हें गजब का रेस्पॉन्स मिला। वे दो-तीन तरह के यार्न मिक्स कर कोटी का कपड़ा बना रहे हंैं। इनकी इकाई में तमाम उत्पादन मेक इन इंडिया का ही होता है। सारे धागे इंडिया निर्मित हंै। एक भी धागा चाइना या अन्य देश का नहीं है, सिलाई मशीनें तक इंडिया मेड है। विशेष यह भी है कि सूरत की कोटी देश के बड़े-बड़े शोरूम में बिकती है। सूरत में कोटी उत्पादन के क्षेत्र में अभी तक आधा दर्जन उद्यमी मैदान में हैं। जो कि करीब प्रतिमाह 15,000 कोटी, ब्लेजर, शेरवनियां बनाते हैं। ये बिक्री फिलहाल प्रतिवर्ष 25 करोड़ के आसपास है, जो एक-दो सालों में 100 करोड़ प्रतिवर्ष तक भी पहुंच जाए तो बड़ी बात नहीं। जेंट्स आधारित रेडमेड गारमेंट में सूरत के उद्यमियों ने अभी तक एंट्री ही ली है, अगर उद्यमियों के रुझान इस तरफ हुआ तो ये इंडस्ट्रीज बड़े पैमाने पर फल-फूल सकती हैं।
कोटी का बड़ा हब मुंबई
सूरत में रिटेल शो रूम के संचालक मुकेश श्रीमाल के अनुसार मुम्बई में भी सूरत, अहमदाबाद, इंदौर आदि शहरों से ही माल चालान हो रहा है। मुम्बई में एक छत के नीचे हजारों वैरायटियां, विभिन्न रंग एवं डिजाइनें उपलब्ध हो जाती है। शोरूम संचालक उत्पादकों की बजाय ट्रेडरों व स्टॉकिस्टों से माल खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं।
दर्जनों कोटी रखने का शौक
युवा व बुजुर्ग अपने पास विभिन्न रंग-डिजाइन की कोटी रखना पसंद कर रहे हैं। यही वजह है कि समृद्ध परिवारों में एक-एक व्यक्ति के पास दर्जनों कोटी वार्डरोब में रहती हैं। सूरत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा पहनावा व दाढ़ी रखकर उनके जैसे दिखने की चाहत रखने वाले जूनियर मोदी उर्फ रमेश पंजाबी के पास तकरीबन 120 मोदी कोटी हैं। वे प्रतिदिन अलग-अलग रंग की कोटी में नजर आते हैं।
Published on:
15 Dec 2019 07:40 pm
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