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साबरमती के संत की तरह चमकेंगे बारडोली के ‘सरदार’

महात्मा गांधी से जुड़े ऐतिहासिक स्थल दांडी के बाद अब सरदार पटेल से जुड़ी बारडोली की विरासत भी जल्द चमकेगी। इस ऐतिहासिक विरासत को..

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'Sardar' of Bardoli will shine like Sabarmati's saint

'Sardar' of Bardoli will shine like Sabarmati's saint

बारडोली।महात्मा गांधी से जुड़े ऐतिहासिक स्थल दांडी के बाद अब सरदार पटेल से जुड़ी बारडोली की विरासत भी जल्द चमकेगी। इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित रखने के लिए केन्द्र सरकार ने जीर्णोद्धार कार्य शुरू कर दिया है। पिछले दिनों केन्द्र सरकार की ओर से गुजरात के तीन हेरिटेज और टूरिज्म सर्किट की घोषणा की गई। इसके तहत राजकोट, पोरबंदर, अहमदाबाद, बारडोली और दांडी को एक सर्किट में जोड़ा गया है। इस हेरिटेज सर्किट में दांडी का विकास कार्य पूर्ण होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नमक सत्याग्रह स्मारक और म्यूजियम राष्ट्र को समर्पित किया। अब बारडोली में भी हेरिटेज और टूरिज्म को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार ने ऐतिहासिक स्वराज आश्रम परिसर में निर्माण कार्य शुरू किया है। पहले चरण में करीब छह करोड़ रुपए की लागत से सरदार पटेल निर्मित भवन के मरम्मत कार्य के अलावा नए ऑडिटोरियम और झंडा चौक का निर्माण कराया जाएगा। सरदार पटेल द्वारा विकसित की गई चीकूवाड़ी में पेवर ब्लॉक लगाए जाएंगे। दूसरे और तीसरे चरण में कौन-कौन-से काम होने वाले हैं, इस बारे में फिलहाल आधिकारिक तौर जानकारी नहीं दी गई है। बारडोली के स्वराज आश्रम में सरदार की यादों को यहां के लोगों ने संजोकर रखा है, लेकिन इसे पर्यटन स्थल के तौर पर विक्सत करने की तरफ सरकार ने पहले विशेष ध्यान नहीं दिया था।

दुर्लभ दस्तावेजों में दर्ज हैं कई किस्से-कहानियां

बारडोली के सरदार पटेल नेशनल म्यूजियम में ऐतिहासिक सत्याग्रह के कई दुर्लभ दस्तावेज, ऑइल पेेंटिंग्स, तस्वीरें आदि सहेज कर रखे गए हैं। आजादी के बाद कई साल तक उपेक्षा के कारण यह सामग्री नमी से खराब हो रही थी। वर्ष 2001 में इस सामग्री को सहेजने का काम शुरू किया गया। जिस इमारत में यह म्यूजियम है, वह 1889 में बनाई गई थी। तब इसका नाम विंचेस्टर म्यूजियम हुआ करता था। वर्ष 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद इसे सरदार पटेल नेशनल म्यूजियम नाम दिया गया। तत्कालीन सरकार ने बारडोली सत्याग्रह में किसानों, मजदूरों के योगदान के सम्मान के लिए यहां सत्याग्रह से जुड़ी सभी तरह की सामग्री को सहेजने का काम शुरू किया।

सरकार का मानना था कि बारडोली सत्याग्रह ने ही 1930 में महात्मा गांधी के दांडी मार्च की पीठिका तैयार की, जिसके बाद ब्रिटिश हुकूमत की उलटी गिनती शुरू हो गई थी। म्यूजियम के दस्तावेजों से 1928 के सत्याग्रह के बारे में काफी कुछ जानने को मिलता है। इन दस्तावेजों के मुताबिक 12 फरवरी, 1928 को सरदार पटेल के साथ हुई किसानों की बैठक में ब्रिटिश हुकूमत को लगान नहीं देने और सत्याग्रह छेडऩे का प्रस्ताव पारित किया गया था। बैठक में किसानों ने ‘रामायण’ और ‘कुरान’ के कुछ हिस्सों का पाठ किया। बाद में ‘प्रभु’ और ‘खुदा’ के नाम पर शपथ लेकर कबीर के भजन गाते हुए सत्याग्रह शुरू किया गया। सरदार पटेल रोज सुबह पांच बजे से आधी रात बाद तक गांव-गांव घूमकर लोगों से सम्पर्क करते थे। बारडोली सत्याग्रह इतना नियोजित और तीव्र था कि उस समय के एक अंग्रेजी अखबार ने एक रिपोर्ट में कहा था कि सरदार पटेल ने बारडोली में बॉलशेविक सत्ता कायम कर दी है और पटेल इसके लेनिन हैं।

आजादी में बारडोली का अहम योगदान

देश की आजादी में बारडोली का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। बारडोली सत्याग्रह में मिली विजय के बाद देशभर में ‘बार्डोलाइज्ड इंडिया’ का नारा गूंज उठा था। बारडोली सत्याग्रह के नेता वल्लभ भाई पटेल को सरदार का उपनाम यहीं दिया गया था। उस दौरान बारडोली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हो चुका था। स्वतंत्रता संग्राम में बारडोली और यहां के लोगों की भूमिका को आने वाली पीढ़ी में बनाए रखने के लिए ऑडिटोरियम बनाया जा रहा है। इसमें बारडोली सत्याग्रह और सरदार पटेल से जुड़ी फिल्मों को दर्शाया जाएगा। ऑडिटोरियम सरदार पटेल राष्ट्रीय संग्रहालय के पीछे बनाया जा रहा है। इसमें करीब ३०० लोग बैठ सकेंगे। यह अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित होगा।

सरदार के लगाए पेड़ आज भी हैं

सूरत शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर बारडोली में सरदार पटेल ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान करीब 22 बीघा जमीन खरीदकर आश्रम बनवाया था। यहां कन्या विद्यालय, छात्रालय, बगीचा और म्यूजियम भी है। सरदार पहली बार 1923 में बारडोली आए थे और किसान आंदोलन में जुड़ गए थे। सरदार पटेल के निवास स्थान के आगे एक बगीचा है। यहां सरदार द्वारा लगाए गए आम और चीकू समेत कई प्रकार के पेड़ आज भी मौजूद हैं। मकान के ऊपरी हिस्से में तीन कमरे हैं, जिनमें कभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी आकर ठहरते थे। इस मकान से थोड़ी दूर एक और भवन है, जहां आजादी की लड़ाई के लिए महात्मा गांधी, सरदार पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरू बैठक किया करते थे। सरदार की याद में बनाए गए म्यूजियम में 18 कमरे हैं। इसमें सरदार वल्लभ भाई पटेल की दुर्लभ तस्वीरें हैं। इन दुर्लभ तस्वीरों को देखने की कीमत महज एक रुपए है, लेकिन म्यूजियम देखने आने वालों की संख्या बहुत कम है। बारडोली के लोग इस बारे में सरकार की उदासीनता से नाराज थे और चाहते थे कि सरदार की कर्मभूमि को उसी तरह पहचान दी जाए, जिस तरह महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम को दी गई।

सरदार ने किया था तीन भवनों का निर्माण

बारडोली में स्वराज आश्रम की स्थापना के बाद सरदार पटेल ने तीन भवनों का निर्माण किया था। इनके निर्माण के लिए बारडोली के किसानों और लोगों से दान तथा सहायता मिली थी। तीन भवनों में एक बड़ा डेला बनाया गया। इसका शिलान्यास वल्लभभाई पटेल ने विक्रम संवत 1979 में किया था। इस डेले में आजादी की लड़ाई के समय महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे नेता ठहरते थे और आंदोलन की व्यूह रचना करते थे। इसी डेले के ग्राउंड फ्लोर पर नेताओं की ओर से पत्रिका लिखी जाती थी। इसमें अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोगों को जागरूक करने के लेख होते थे।