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बोले बुजुर्ग, बदल गया चुनाव प्रचार का तरीका

पहले चुनाव इतना खर्चीला और प्रत्याशियों में बनावटीपन नहीं थाअब बड़ी रैलियों और सभाओं पर रहता है जोर

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सूरत

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Sunil Mishra

Apr 10, 2019

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बोले बुजुर्ग, बदल गया चुनाव प्रचार का तरीका


वापी. लोकसभा चुनाव में जनता नई सरकार के साथ अपने क्षेत्र के विकास के लिए नुमाइंदे भी चुनेगी। हर तरफ बड़ी रैलियां, सभाओं का जोर है। ऐसे में देश में कई चुनावों को देख चुके और मतदान कर चुके बुुजुर्गों ने बताया कि जमाने के साथ-साथ चुनाव प्रचार का तरीका बदल गया है। सभी बुजुर्गों ने एक बात यह बताई कि अबकी तरह चुनाव इतना खर्चीला और उम्मीदवारों में बनावटीपन नहीं था, न तो रुपए से भीड़ एकत्र की जाती थी।

घर से खाना लेकर प्रचार में जुड़ते थे लोग
जीवन के 65 बसंत पार कर चुके छीरी गांव निवासी दीपक परमार बताते हैं कि 70-80 के दशक पहले अधिक से अधिक जनसंपर्क सीमित संसाधनों से चुनाव लड़ा जाता था। लोग प्रचार के लिए गांव में आने वाले उम्मीदवार का स्वागत तिलक लगाकर करते थे। उस दौरान लोकगीतों में ही समस्याओं का जिक्र रहता था और लोग स्वयंभू पैदल चुनाव प्रचार के लिए उम्मीदवार के साथ अपने घर से खाना पानी लेकर निकलते थे। प्रचार में आज की तरह रुपए बांटकर जबरदस्ती की भीड़ एकत्रित नहीं होती थी। जमीनी मुद्दों पर उम्मीदवार बात करते थे। जनप्रतिनिधि और लोगों के बीच आज की तरह इतना अंतर नहीं था। चुनाव प्रचार करने वाले उम्मीदवार का स्वागत लोग इस तरह करते थे मानों वह जीतकर आया है। उस दौरान के उम्मीदवारों में आज की अपेक्षा प्रमाणिकता भी ज्यादा थी। परंपरागत वाद्ययंत्रों की जगह प्रचार में आज डीजे का शोर इतना ज्यादा है कि वास्तविक मुद्दे उसी में दब जाते हैं। निजी आरोप प्रत्यारोप नहीं होते थे।

जीतने वाले की सभा में ज्यादा लोग
पुराने दिनों के चुनाव प्रचार को याद करते हुए जीवन के कई साल मुंबई और करीब 35 सालों से वापी में रहने वाले सुधीर देसाई बताते हैं कि पहले की बात और तरीका ही अलग था। उम्मीदवार और मतदाता भी आज की अपेक्षा ज्यादा ईमानदार थे। उन दिनों स्थानीय समस्याओं पर ज्यादा फोकस हुआ करता था। याद है 1977 में जब मुंबई में था उस दौरान लोगों ने नारा दिया था कि दिल्ली वाले पानी में, पानी वाले दिल्ली में। इसका अर्थ था कि दिल्ली की गद्दी पर बैठे लोगों को हरा दिया जाए और क्षेत्र में पानी समेत अन्य सुविधाओं को मुहैया करा सकने वालों को दिल्ली भेजा जाए। ऐसा हुआ भी। सुधीर देसाई बताते हैं कि उस दौरान 99 प्रतिशत चुनाव पैदल ही होता था और पार्टी कार्यालयों के बाहर बोर्ड पर लिखी सूचना से पता चलता था कि आज सभा कहां होने वाली है और कौन नेता भाषण देगा। आज की तरह अखबारों, पंपलेट और टीवी के माध्यम नहीं थे। उस दौरान दीवारें ही उम्मीदवार और पार्टी की पहचान लोगों में स्थापित करने का सबसे बड़ा माध्यम हुआ करती थी। जिसकी सभा में ज्यादा लोग दिखते थे यह आभास हो जाता था कि कौन जीत रहा है। आज के दौर में किराए की भीड़ हर दल एकत्र कर रहा है। तब पार्टी के साथ जनता भी चुनाव लडऩे वाले की निष्ठा देखती थी। आज तो उम्मीदवार का रुपया ही देखा जाता है। एक दूसरे के प्रति उम्मीदवारों में आज की तरह निम्न स्तर की भाषा का उपयोग नहीं होता था। उस दौर में आचार संहिता का नियम न लागू होने से देर रात तक उम्मीदवार प्रचार के लिए आते थे।

झूठ का नहीं लेते थे सहारा
सेवानिवृत्त शिक्षक हेमंत देसाई के अनुसार पहले राजनीतिक दल या उम्मीदवार चुनाव प्रचार में आज की तरह झूठ और मर्यादा के विपरीत भाषण नहीं देते थे। समर्थक बिना बुलाए ही सभाओं में पहुंचते थे। इतना शोरगुल और नारेबाजी नहीं होता था। हेमंत देसाई ने बताया कि अब भी याद है जब चुनाव कार्यालय के सामने बिल्ले और प्रचार सामग्री लेने वालों की भीड़ रहती थी। यह भीड़ निष्ठावान कार्यकर्ताओं की रहती थी। रुपए का इतना दिखावा नहीं था। तब से अब के चुनाव प्रचार में दिन और रात का फर्क आ गया है।