सूरत. नई सिविल अस्पताल में मानसिक और शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों के लिए फिजियोथेरेपी कॉलेज में डिस्ट्रिक्ट अर्ली इन्टरवेंशन सेन्टर (डीईआईसी) के तहत सेंसरी गार्डन शुरू किया गया है। इस केंद्र में विशेष रूप से दक्षिण गुजरात सहित विभिन्न राज्यों से मानसिक विकलांग बच्चे इलाज के लिए आते हैं। ऐसे बच्चों में मानसिक परिवर्तन और संवेदी विकास लाने के लिए पहली बार दो लाख रुपए के अनुदान से सेंसरी गार्डन विकसित किया गया है।
सूरत के नई सिविल अस्पताल में हर रोज अलग-अलग बीमारियों के मरीज इलाज के लिए आते हैं। साथ ही, अस्पताल में मानसिक और शारीरिक विकलांग बच्चों के लिए डीईआईसी थेरेपी वर्ष 2016 में शुरू किया गया था। यहां अब तक 56,794 बच्चों का इलाज किया जा चुका है। इनमें से कई बच्चे ठीक भी हो चुके हैं। केंद्र की डॉ. हर्षिता पटेल ने राजस्थान पत्रिका को बताया कि डीईआईसी में शारीरिक और मानसिक रूप से विक्षिप्त बच्चे आते हैं। इसमें कुछ बच्चे जो शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण चल नहीं सकते उन्हें उपचार दिया जाता है। ऐसे ही बच्चों के लिए सेंटर में पहली बार आर्टिफिशियल गार्डन बनाया है। यह पहला प्रयास है और इस गार्डन को बनाने की खास वजह यह है कि हमें इन बच्चों के लिए अलग-अलग एक्टिविटीज करनी पड़ती हैं, लेकिन गार्डन में हमने जो इक्विपमेंट लगाए उससे यह काफी आसान हो गया हैं। जब हम बच्चों को झूला खिलाते हैं तो बच्चों के कानों में फ्ल्यूड होता है जो ऐसे ही झूलता है। उनका धीरे-धीरे मानसिक और शारीरिक विकास होता है। दूसरा उद्देश्य यह है कि ऐसे बच्चे सार्वजनिक उद्यानों में नहीं जा सकते। सामान्य बच्चों के साथ नहीं खेल सकते। माता-पिता भी उन्हें बगीचे में ले जाने से डरते हैं। इसलिए हमने यहां यह आर्टिफिशियल गार्डन बनाया है। आरएमओ डॉ. केतन नायक ने बताया कि सरकार की ओर से यह प्रयास पहली बार किया गया है। इसके लिए करीब दो लाख रुपए का अनुदान मिला है। इसमें करीब डेढ़ लाख रुपए के खिलौने शारीरिक और मानसिक रुप से विकलांग बच्चों के लिए खरीदे गए हैं। शेष राशि के खिलौने भी जल्द ही अस्पताल पहुंच जाएंगे।
प्रतिदिन 35 से 45 बच्चे आते हैं
डिस्ट्रिक्ट अर्ली इन्टरवेंशन सेंटर में प्रतिदिन 35 से 45 बच्चे आते हैं। यहां कई शारीरिक और मानसिक विकलांग बच्चे स्वस्थ हो जाते हैं। कई माता-पिता उम्मीद छोड़ देते हैं। ऐसे बच्चे भी अच्छे बनते हैं। हाल ही में एक अभिभावक पिछले 4 साल से अपने बच्चे को लेकर आ रहे थे। उन्होंने उम्मीद भी छोड़ दी थी, लेकिन हमने उसका इलाज और थैरेपी जारी रखी। बच्चा ठीक हो गया है।
डॉ. गणेश गोवेकर, अधीक्षक, नई सिविल अस्पताल, सूरत।