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मनपा खोज रही आय बढ़ाने के स्रोत

वित्तीय घाटे को पाटने की कवायद

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सूरत

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Vineet Sharma

Mar 05, 2018

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सूरत. कर दर में वृद्धि के प्रस्ताव में कटौती के बाद मनपा प्रशासन पर आय बढ़ाने नए स्रोत खोजने का दबाव है। वित्तीय घाटे को पाटने के लिए अधिकारियों से सुझाव मांगे जा रहे हैं।

मनपा प्रशासन बीते कई वर्षों से आर्थिक दबाव में है। राजस्व एवं केपिटल खर्च बढऩे और आय की सीमित संसाधनों में काम कर पाना मुश्किल हो रहा है। आगामी दो वर्षों में राजस्व खर्च में और वृद्धि होनी है, जिसका दबाव अभी से महसूस किया जा रहा है। इन जरूरतों को पूरा करने के लिए मनपा आयुक्त एम थेन्नारसन ने वित्त वर्ष 2018-19 के लिए कर दर में अप्रत्याशित वृद्धि की थी। हालांकि इसके बाद भी सूरत महानगर पालिका की कर दर प्रदेश की अन्य कई पालिकाओं के मुकाबले कम ही थी।

कांग्रेस ने जिस तरह से इसके खिलाफ अभियान चलाया और प्रदर्शन किया, सत्ता पक्ष दबाव में आ गया। बजट चर्चा के लिए स्थाई समिति की बैठक के दौरान हुए कांग्रेस हंगामे के बाद मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने दखल देते हुए सत्तापक्ष को कर दर में कटौती की हिदायत दी थी। जिसके बाद स्थाई समिति ने बढ़ाई गई दरों में भारी कटौती की थी।
सामान्य सभा से बजट पारित होने के बाद मनपा प्रशासन के समक्ष आय और खर्च के बीच की खाई को पाटने की चुनौती है। अधिकारियों को समझ नहीं आ रहा कि इससे पार कैसे पाई जाए। इस मुश्किल से पार पाने के लिए मनपा आयुक्त ने विभागीय प्रमुखों को आय के स्रोत बढ़ाने के उपाय सुझाने को कहा है। विभागीय प्रमुखों के लिए भी यह चुनौती से कम नहीं कि मनपा की आय कैसे बढ़ाई जाए।

खर्च तो बढ़ेगा ही

अधिकारियों की मानें तो राजस्व वसूली की अपेक्षा खर्च का आंकड़ा बड़ा है। आने वाले दो वर्ष मनपा के लिए अग्नि परीक्षा साबित होंगे। इन वर्षों में बड़ी संख्या में कर्मचारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उन्हें सेवा निवृत्ति लाभ देने के साथ ही वेतन आयोग की सिफारिशों पर अमल का दबाव भी मनपा को झेलना होगा। यानी राजस्व खर्च तो लगातार बढऩा तय है लेकिन राजस्व आय जस की तस रहनी है।

केपिटल खर्च पर लटकी तलवार

इस खर्च को पाटने के लिए मनपा के पास फिलहाल एक ही विकल्प दिखता है कि केपिटल खर्च में कटौती की जाए। वित्त वर्ष 2018-19 के लिए अधिकारियों को कहा गया है कि वर्कप्लान तैयार करते समय जरूरी प्रोजेक्ट्स पर ही फोकस किया जाए। जिन प्रोजेक्ट्स की फिलहाल जरूरत नहीं है, उन्हें भविष्य के लिए स्थगित रखा जाए। इससे केपिटल खर्च को कम किया जा सकता है। जानकारों का मानना है कि केपिटल कामों के लिए मनपा के पास फिलहाल पर्याप्त फंड नहीं है। ऐसे में केपिटल खर्च पर लगाम कसना मनपा की मजबूरी भी है।