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SURAT SPECIAL NEWS: 300 साल पुरानी बावड़ी, आज भी रखती है गला तर

: जीवित जल स्त्रोतों में से एक, संरंक्षण की मांग - सूरत जिले में मांगरोल तहसील के हथुरण गांव में घुमंतू बंजारों ने बनाई थी बावड़ी

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SURAT SPECIAL NEWS: 300 साल पुरानी बावड़ी, आज भी रखती है गला तर

SURAT SPECIAL NEWS: 300 साल पुरानी बावड़ी, आज भी रखती है गला तर

सूरत. राजस्थान, महाराष्ट्र समेत अन्य राज्यों में स्थित पुराने महल-किलों में तब राजा-महाराजा पीने का पानी सुरक्षित रखने के लिए कुएं-बावड़ी बनवाते थे। 300 साल पुरानी ऐसी ही एक बावड़ी गुजरात के सूरत जिले में भी है, लेकिन इस बावड़ी का निर्माण राजा-महाराजा ने नहीं, बल्कि घुमंतू बंजारा जाति के लोगों ने अपने व जानवरों के पीने के पानी के लिए करवाया था। तीन शती बाद भी यह बावड़ी जिले में मांगरोल तहसील स्थित हथुरण गांव के लोगों के लिए उतनी ही उपयोगी बनी हुई है।

सरकार की हर घर नल योजना से अब गांव-देहात में भी लोगों को (खासकर महिलाओं को) कोसों दूर पानी लेने नहीं जाना पड़ता। मगर हथुरण गांव के लोग घर-घर नल होने के बावजूद पानी तो बावड़ी का ही पीते हैं। यहां के ग्रामीण इस तीन सौ साल पुरानी बावड़ी को संरक्षित करने की मांग भी करते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि करीब तीन सौ साल पहले घुमंतू बंजारा जाति के लोगों ने हथुरण गांव में पड़ाव डाला था। तब उन्होंने अपने व अपने जानवरों के पीने के पानी के लिए गांव में इस बावड़ी का निर्माण करवाया था। तब से यह बावड़ी स्थानीय लोगों को पीने के पानी के काम आ रही है।

- राजस्थानी शिल्पकला का नमूना :

बंजारा जाति के लोगों ने इस बावड़ी के निर्माण में राजस्थानी शिल्पकला की कारीगरी दिखाई है। ज्यादातर बावडिय़ां राजा-महाराजाओं की देखरेख में बनाई गई है। उनकी बनावट, शिल्पकला में वैसी ही बेजोड़ भव्यता रहती है। हथुरण स्थित बावड़ी छोटी है और इसके चारों तरफ मोटी सुरक्षा दीवार व एक तरफ मेहराबदार ड्योढ़ी है। इसमें से पानी खींचकर जानवरों को पिलाने के लिए ढलान रखी गई थी।

- पानी रहता है सदैव शीतल :

हथुरण गांव स्थित बावड़ी की बनावट इस तरह से की गई थी कि इसमें संचित जल पर सूर्य की सीधी किरणें नहीं पड़ती और जल वाष्पित भी नहीं होता। इस वजह से बावड़ी का पानी सदैव शीतल रहता है। गांव की ही मनीषा वसावा बताती हैं कि पांच सीढ़ी नीचे बावड़ी में पानी हमेशा रहता है। इसका पानी पाचन में बेहद उपयोगी है और बीमारियों से बचाव करता है।

- उचित रखरखाव का अभाव :

सूरत जिले के कोसंबा, कीम, कठोदरा आदि गांवों में भी कई पुराने कुएं-बावड़ी थे, लेकिन वे रखरखाव के अभाव में नष्ट हो गए। हथुरण गांव में यह अकेली पुरानी बावड़ी है। ग्रामीण चाहते हैं कि इस बावड़ी को सुरक्षित व संरक्षित रखने के लिए जिला प्रशासन बेहतर प्रयास करें, ताकि पुरानी धरोहर के रूप में इसे सुरक्षित व संरक्षित रखा जा सके।