
प्रहार...कपड़ा उद्योग को संजीवनी देकर बचाए सरकार
- राजेश कसेरा
जिस कपड़ा उद्योग की बदौलत सूरत का नाम देश-दुनिया में सिल्कसिटी के तौर पर ख्यात हुआ, उसी शहर में यह कारोबार संकट में है। बीते तीन वर्षों में नोटबंदी और जीएसटी के बाद खस्ता हाल हुई अर्थव्यवस्था में बड़ी मार झेलने वाले उद्योगों में यह शामिल है। जीएसटी के साथ इ-वे बिल, आइटीसी-04, इंट्रेस्टेड इ-वे बिल, मंथली रिटर्न, परचेज-सेल बिल जैसी न जाने कितनी कागजी व्यवस्थाओं ने उद्यमियों का तेल निकाल कर रख दिया। बरसों से परम्परागत तरीके से कारोबार कर रहे व्यापारियों पर टैक्स के नाम पर इतनी तरह की औपचारिक पेचीदगियां पैदा कर दी गई कि उन्हें अपना धंधा बंद करना या बदलना ज्यादा आसान लगा। शहर के हाल इस कदर बुरे हैं कि ऊपर से दिखाई दे रही कपड़े की सुंदरता असल में भीतर से काफी भयानक हो गई है। रोजगार देने वाले शहर के लोग खुद बेरोजगार हो गए।
जिस सरकार को कपड़ा कारोबार पोषित करना था, उसने ही सुध नहीं लेकर इसे बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया। बड़े उद्यमियों तो जैसे-तैसे कारोबार को चलाने के लिए मोटा खर्च करके तरीके ढूंढ लिए, पर निचले और मध्यम व्यापारी सिस्टम के मकडज़ाल में ऐसे उलझे कि कारोबार के मैदान से ही बाहर हो गए। इस समय सूरत के कपड़ा व्यवसाय से जुड़े बीस लाख से ज्यादा लोगों की पीड़ा को हरने वाला कोई नहीं है। कपड़ा मंत्रालय नित-नए आदेशों को थोपने में व्यस्त हैं तो शीर्ष पदों पर बैठे अधिकारी सरकारी चाबुक को बरसाने में। केन्द्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकार ने भी सिल्कसिटी से मुंह मोड़ लिया। किसी जिम्मेदार को करोड़ों-अरबों रुपए का राजस्व देने वाले व्यापारियों के दिलो-दिमाग में मची उथल-पुथल न तो दिखाई दे रही है, न ही महसूस हो रही है।
कुछ सुनाई दे रहा है तो खजाने में बरसती धनराशि की खनक, जो सरकार की मुस्कुराहट को कई गुना बढ़ा रही है। खुशी का पारावर इतने शिखर पर है कि कपड़ा कारोबारियों के माथे पर खिंची चिंता की लकीरें और आंखों से बह हरी अश्रुधार भी नहीं दिख रही है। लगातार अनदेखी का दर्द झेल रहे कपड़ा उद्योग को जल्द नहीं संभाला गया तो स्थितियां और बिगड़ जाएंगी। सरकार को वित्तीय कानून लागू करने के साथ-साथ हर उद्योग में आ रही जमीनी समस्याओं को भी गंभीरता से समझना और निराकरण करना होगा। अफसरों को समझना होगा कि जिन ऑनलाइन प्रक्रियाओं की जटिलताओं से व्यापारी गुजर रहे हैं, उनकी समझ उनको कितनी है?
जिन्होंने कागजी पर्चियों से कारोबार की एबीसीडी सीखी, यदि उनसे महीने में कई तरह के ऑनलाइन रिटन्र्स भरवाएंगे तो कैसे वे बेहतर व्यवस्था का भागीदार बन पाएंगे? नियम-कायदों की पालना कराने वाले सिस्टम को जमीनी स्तर पर आकर व्यापारियों की तकलीफों को समझना होगा। उन जनप्रतिनिधियों को भी इसमें सहयोग करना होगा, जो कपड़ा कारोबार से जुड़े लाखों लोगों के भरोसे को लेकर सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे हैं। इसके लिए समय और जाया नहीं किया जाए। जल्द से जल्द वेंटिलेटर पर आए कपड़ा उद्योग को विश्वास और सहयोग की ऑक्सीजन देनी होगी। तभी सिल्कसिटी की पहचान कायम रह पाएगी।
rajesh.kasera@epatrika.com
Published on:
01 Jun 2018 04:42 pm
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