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SPECIAL STORY : बच्चों के यौन उत्पीडऩ व हिंसा पर नहीं लग रही लगाम!

- इंटरनेशनल डे फॉर इनोसेन्ट चिल्ड्रन विक्टिम ऑफ अग्रेशन - पोक्सो एक्ट के बावजूद आठ वर्षो में चार गुना तक मामले बढ़े

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SPECIAL  STORY : बच्चों के यौन उत्पीडऩ व हिंसा पर नहीं लग रही लगाम!

SPECIAL STORY : बच्चों के यौन उत्पीडऩ व हिंसा पर नहीं लग रही लगाम!

दिनेश एम.त्रिवेदी

सूरत. बच्चों के यौन उत्पीडऩ व उनके साथ हिंसा के मामलों पर लगाम नहीं लग रही है। कड़े कानून व गुड-टच बैड-टच की समझ को लेकर चलाए गए जागरुकता अभियानों के बावजूद मामले कम नहीं हो रहे है। 2012 यौन अपराधों से बच्चों के सुरक्षा के लिए पोक्सो एक्ट (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन अगेंस्ट सेक्सुयल ऑफेन्सेज) बनाया गया था।

जिसमें कड़ी सजा के प्रावधान रखा गया है। इसके बावजूद प्रदेश में पोक्सो एक्ट मामले कम नहीं हो रहे हैं। गुजरात में 2014 से 2021 के दौरान 14 हजार 522 मामले दर्ज हो चुके हैं। जिनमें से 231 मामलों में ही दोषियों का सजा सुनाई गई थी, जबकि अधिकतर मामले लंबित थे।

पिछले दिनों केन्द्रीय मंत्री द्वारा गुजरात के आंकड़े सार्वजनिक करने पर विफक्ष ने इस मामले पर हल्ला मचाया। पिछले दो वर्षो में राज्य सरकार ने पोक्सो व मासूमों की हत्या से जुड़े गंभीर मामलों को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया। इनमें से कुछ मामलों में आरोपियों को फांसी की सजा भी सुनाई गई। उच्च न्यायालयों में अपील समेत न्यायिक प्रक्रिया के चलते किसी भी दोषी अभी तक फांसी हुई नहीं हैं।

0 सार्वजनिक नहीं किए जाते आंकड़े

पुलिस विभाग की वेबसाइट पर अन्य अपराधों के सालाना आंकड़े तो सार्वजनिक किए जाते है, लेकिन महिलाओं व बच्चों से जुड़े अपराधों के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जाते है। पोक्सो एक्ट के आंकड़े मांगने पर पुलिस अधिकारियों को रवैया टालने वाला रहता है।

0 बच्चों पर पड़ता है गहरा प्रभाव

सूरत में कार्यरत मुंबई के एनजीओ प्रथम से जुड़ी काउन्सलर सीता ने बताया कि बच्चों से यौन उत्पीडऩ व हिंसा न केवल उनके जीवन और स्वास्थ्य को, बल्कि उनके भावात्मक कल्याण और भविष्य को भी खतरे में डालती है। घटना के बाद छोटे बच्चे बेहद डरे हुए होते उनको विश्वास में घटना के बारे में ही बहुत समय लग जाता हैं। कई मामलों में तो चार से पांच बार विजीट करने ही कुछ पता चलता है। प्रोपर काउन्सलिंग के बाद अधिकतर बच्चे सामान्य तो हो जाते है लेकिन प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं होता है।

0 दुनिया के 64 फीसदी बच्चे सिर्फ दक्षिण एशिया में

संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक पूरी दुनिया में हिंसा व उपेक्षा के शिकार 64 फीसदी बच्चें दक्षिण एशिया में हैं। दक्षिण एशिया में भी सबसे अधिक बच्चे भारत में हैं। हमारे देश में प्रतिदिन लाखों बच्चे इसे झेलते है। दुनिया भर में सभी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के सभी उम्र, धर्मों और संस्कृतियों के लाखों बच्चे हर दिन हिंसा,शोषण और दुर्व्यवहार का शिकार होते हैं। यह हिंसा शारीरिक,यौन और भावनात्मक हो सकती है और उपेक्षा का रूप भी ले सकती है।

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