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वेदों में मौजूद हैं विवाह की परम्पराएं

हिन्दू धर्म का एकमात्र धर्मग्रंथ वेद हैं। वेद अनुसार किए गए विवाह संस्कार ही शास्त्रसम्मत होते हैं। वेदों के अलावा गृहसूत्रों में संस्कारों का उल्लेख
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सूरत

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Mukesh Kumar Sharma

•

Updated: 28 Jan 2018, 10:27 PM IST

Traditions of marriage are present in the Vedas

Traditions of marriage are present in the Vedas

हिन्दू धर्म का एकमात्र धर्मग्रंथ वेद हैं। वेद अनुसार किए गए विवाह संस्कार ही शास्त्रसम्मत होते हैं। वेदों के अलावा गृहसूत्रों में संस्कारों का उल्लेख मिलता है। विवाह को हिन्दुओं के प्रमुख 16 संस्कारों में से माना जाता है जो कि बहुत ही पवित्र कर्म होता है। इसी संस्कार के बाद व्यक्ति गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है। यदि यह संस्कार उचित रीति से नहीं हुआ है तो यह महज एक समझौता ही होगा। आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नी के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, दूसरी ओर वर पक्ष की हैसियत, धन, सैलरी आदि देखी जाती हैं। यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। लोगों की इसी सोच के कारण दाम्पत्य-जीवन और परिवार बिखरने लगे हैं।

विवाह संस्कार में पाणिग्रहण का अर्थ

पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से ‘विवाह’ के नाम से जाना जाता है। वर द्वारा नियम और वचन स्वीकारोक्ति के बाद कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दें। इस प्रकार दोनों एक-दूसरे का पाणिग्रहण करते हैं। कालांतर में इस रस्म को च्कन्यादानज् कहा जाने लगा, जो कि अनुचित है। हिन्दू धर्म में विवाह में जब तक सात फेरे नहीं हो जाते, तब तक विवाह संस्कारपूर्ण नहीं माना जाता। न एक फेरा कम, न एक ज्यादा। इसी प्रक्रिया में दोनों सात फेरे लेते हैं जिसे च्सप्तपदीज् भी कहा जाता है। ये सातों फेरे या पद सात वचन के साथ लिए जाते हैं। हर फेरे का एक वचन होता है जिसे पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वादा करते हैं। ये सात फेरे ही हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं। अग्नि के सात फेरे लेकर और सबको साक्षी मानकर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।

विवाह एक, रीतियां अनेक

हिन्दू धर्म के अनुसार विवाह ऐसा कर्म या संस्कार है जिसे समझदारी से करने की आवश्यकता है। दूर-दूर तक रिश्तों की छानबीन आवश्यक है। जब दोनों पक्ष सभी तरह से संतुष्ट हो जाते हैं तभी इस विवाह को किए जाने के लिए शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। इसके बाद वैदिक पंडितों के माध्यम से विशेष व्यवस्था, देवी पूजा, वर वरण तिलक, हरिद्रालेप, द्वार पूजा, मंगलाष्टकं, हस्तपीतकरण, मर्यादाकरण, पाणिग्रहण, ग्रंथिबन्धन, प्रतिज्ञाएं, प्रायश्चित, शिलारोहण, सप्तपदी, शपथ आश्वासन आदि रीतियों को पूर्ण किया जाता है।

कानूनन भी विवाह की उम्र पूरी होना जरूरी

कानूनी रूप से विवाह के लिए लडक़ी की उम्र 18 वर्ष और लडक़े की उम्र 21 वर्ष तय की गई है। हालांकि बायोलॉजिकल रूप से लडक़ा या लडक़ी दोनों 18 वर्ष की उम्र में विवाह योग्य हो जाते हैं, लेकिन कानून और परंपरा का निर्वहन भी आज के समय में बेहद आवश्यक हो गया है। जबकि पुरातन समय की बात करें तो लडक़े और लड़कियों का विवाह बचपन में ही कर दिया जाता था और विवाह की परंपराएं भी अजीबोगरीब थीं। बाद में व्यवस्था और हालात बदलने के बाद स्वरूप बदलता चला गया।

हिन्दू दर्शन में विवाह की उम्र 25 वर्ष

हिन्दू दर्शन के मुताबिक आश्रम प्रणाली में विवाह की उम्र 25 वर्ष थी जिससे बेहतर स्वास्थ्य और कुपोषण की समस्या से छुटकारा मिलता था। ब्रह्मचर्य आश्रम में अपनी पढ़ाई पूर्ण करने के बाद ही व्यक्ति विवाह कर सकता था। उम्र में अंतर होने के मामले हिन्दू धर्म कोई खास हिदायत नहीं देता। लडक़ी की उम्र अधिक हो, समान हो या कि कम हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि दोनों की पढ़ाई अच्छे से संस्कारबद्ध हुई है तो दोनों में ही समझदारी होगी। यदि दोनों ही हिन्दू धर्म के बारे में नहीं जानते हैं और संस्कारवान नहीं है तो उनका विवाह मात्र एक समझौताभर ही रहेगा। यह समझौता कब तक कायम रहेगा यह नहीं कह सकते।

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