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बारडोली में ‘सरदार’ बनकर उभरे वल्लभभाई

लौहपुरुष के रूप में पहचाने जाने वाले वल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि बारडोली सत्याग्रह के दौरान स्थानीय लोगो ने दी थी, जिसे पूरे देश ने स्वीकार किया।

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Vallabhbhai emerged as 'Sardar' in Bardoli

Vallabhbhai emerged as 'Sardar' in Bardoli

सूरत।लौहपुरुष के रूप में पहचाने जाने वाले वल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि बारडोली सत्याग्रह के दौरान स्थानीय लोगो ने दी थी, जिसे पूरे देश ने स्वीकार किया। 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की जयंती पर उनकी कर्मभूमि बारडोली के स्वराज आश्रम में प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाएगा। यहां सरदार द्वारा लगाए गए आम और चीकू के पेड़ आज भी मौजूद हैं।


बारडोली के स्वराज आश्रम में सरदार की यादों को संजोकर रखा गया है, लेकिन अभी तक इसे ऐतिहासिक पर्यटन स्थल बनाने की ओर सरकार ने विशेष ध्यान नहीं दिया है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान 1928 में प्रांतीय सरकार ने किसानों के लगान में तीस प्रतिशत इजाफा कर दिया था।

पटेल ने इस वृद्धि का जमकर विरोध किया। अंग्रेजी हुकूमत ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए कई कठोर कदम उठाए, लेकिन अंतत: उसे किसानों की मांगों को मानना पड़ा। दो अधिकारियों की जांच के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने 30 फीसदी लगान घटाकर करीब 6 फीसदी कर दिया था। इस आंदोलन की सफलता के बाद यहां की महिलाओं ने वल्लभभाई को च्सरदारज् की उपाधि दी। सूरत शहर से करीब 35 किमी दूर बारडोली में सरदार पटेल ने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान करीब 22 बीघा जमीन खरीदकर आश्रम बनाया था। यहां कन्या विद्यालय, छात्रालय, बगीचा और म्यूजियम बना हुआ है। सरदार पहली बार 1923 में बारडोली आए थे और किसान आंदोलन में जुड़ गए थे।

सरदार पटेल के निवास स्थान के आगे एक बगीचा है। यहां सरदार द्वारा लगाए गए आम और चीकू समेत कई अलग-अलग प्रकार के पेड़ आज भी मौजूद हैं। मकान के ऊपरी हिस्से में तीन कमरे हैं, जिनमे कभी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी आकर ठहरते थे। इस मकान से थोड़ी दूर एक और भवन है, जहां आजादी की लड़ाई के लिए महात्मा गांधी, सरदार पटेल और पंडित जवाहरलाल नेहरू बैठक किया करते थे।

कम ही आते हैं म्यूजियम देखने

बारडोली सत्याग्रह की नींव रखने वाले सरदार की याद में यहां म्यूजियम बनाया गया है। यह म्यूजियम 18 कमरों का है। यहां सरदार वल्लभ भाई पटेल की दुर्लभ तस्वीरें हैं। इन दुर्लभ तस्वीरों को देखने की कीमत महज एक रुपए है, लेकिन म्यूजियम देखने आने वालों की संख्या बहुत कम है। बारडोली के निवासी इस बारे में सरकार की उदासीनता से नाराज हैं। वह चाहते हैं कि सरदार की इस कर्मभूमि को उसी तरह पहचान दी जाए, जिस तरह महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम को दी गई।