
विकास से कोसों दूर आदिवासी गांवों की महिलाएं
सिलवासा. सरकार द्वारा संचालित तमाम योजनाओं के बाद भी गांवों में आदिवासी महिलाएं बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर हैं। यह महिलाएं कठिन परिश्रम करने के बावजूद दैनिक जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही हैं। प्रदेश के पिछड़े गांवों में पक्के मकान, पौष्टिक खाना, कुटीर उद्योग, आर्थिक संसाधनों की कमी हैं।
खानवेल परिक्षेत्र के रूदाना, सिंदोनी, मांदोनी, कौंचा, आंबोली, खेरड़ी, सुरंगी, दपाड़ा ग्राम पंचायत के गांवों में आदिवासी महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ नहीं है। इन गांवों में सिंचाई की योजनाओं के अभाव से खेती और पशुपालन का अभाव है। 3000 से अधिक औद्योगिक इकाइयां स्थापित होने के बावजूद प्रदेश में रोजगार की मुख्य समस्या है।
महिलाओं को न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता
आदिवासी महिलाएं रोजगार के लिए उद्योगपतियों, धनाढ्य सेठ, भूपति, लेबर ठेकेदारों के आगे हाथ फैलाती रहती हैं। सरकारी नौकरी करने वाली महिलाओं अंडर रूल 43 ऑफ दी सेंट्रल सिविल सर्विस रूल्स 1972 के तहत 180 दिन का प्रसूति अवकाश मिलता है, वहीं प्राइवेट इकाइयों और ठेकेदार के अधीन काम करने वाली महिलाओं को न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता है। ठेकेदारों के पास काम करने वाली महिलाओं की प्रसूति के दौरान बिना वेतन के छुट्टी कर दी जाती है। इमारत, पूल, सडक़ जैसे निर्माण कार्यों में लगी महिलाओं को भारी परिश्रम के बावजूद प्रसूति, पेयजल, शौचालय, स्वास्थ्य जैसे सुविधाएं नहीं मिलती हैं। सिंदोनी, मांदोनी के गांवों में महिलाएं जीवन की जरूरत पूरी करने के लिए संघर्षरत हैं।
कमाई चली जाती शराब में
दादरा नगर हवेली में शराब की खुली छूट से विकास योजनाओं पर पानी फिर जाता है। गांवों में अधिकंाश युवक-युवतियां कमाई का ज्यादा हिस्सा शराब में गंवा देते हैं। शराब की लत से शारीरिक दुबर्लता व कमजोरी से युवा पीढ़ी बीमारियों की शिकार हो रही हैं। शराब पीने के कारण सडक़ दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। कई युवतियां भरी जवानी में विधवा हो जाती हैं। शराब पर रोक के लिए कोई जनप्रतिनिधि व समाजसेवी संस्था सामने नहीं आई हैं। हालांकि आदिवासी समाज उत्कर्ष संघ ने हाल में शराबबंदी के लिए आवाज उठाई है।
बुजुर्ग करते हैं काम
कई परिवारों में बुजुर्ग महिलाएं घासफूस और मिट्टी के बने झोपड़े में रहने को मजबूर हैं। चिखली पारसपाड़ा निवासी बुजुर्ग भादिया चंदरू दुमाड़ा दंपती एक पांव के सहारे बांस की टोकरी, झाड़ू, चटाई आदि बुनकर जीवन की गाड़ी चला रहा है। 78 वर्षीय भादिया चंदरू का एक पैर चोट लगने के बाद संक्रमण के चलते 30 वर्ष पहले डॉक्टरों ने काट दिया था। इसके बाद परिवार जंगली संपदा पर आश्रित हो गया।
अपनों से सुरक्षित नहीं किशोरियां
गत वर्ष सिलवासा थाने में नाबालिग के साथ यौन शोषण के मामले दर्ज हुए हैं। ज्यादातर मामलों में किशोरियां अपने परिजनों, रिश्तेदार व जान-पहचान वालों से यौन शोषण की शिकार बनी हैं। वर्ष 2018 मे थाने में दर्ज कुल 15 मामलों में 13 मामले में किशोरियां अपने संगे संबंधियों की शिकार हुई हैं। इसमें एक मामले में किशोरी ने मृत बच्चे को भी जन्म दिया था। पुलिस के अनुसार यौनाचार करने वालों में उनके रिश्तेदार ही ज्यादा हैं।
Published on:
08 Mar 2019 05:58 pm
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