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बेटी के दीदार को तरसती, Refugee Camp में दिन गुजार रही बूढ़ी मां

82 साल की पेमा के चेहरे में पड़ी झुर्रियां सिर्फ उम्र का बखान नहीं कर रही, बल्कि यह चिंता और मायूसी की सिलवटें हैं जो उम्र के अंतिम पड़ाव में अपनो से दूर रहने की पीड़ा भोगने के कारण पड़ी हैं

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Chandu Nirmalkar

May 08, 2016

Old Age mother

Old Age mother

श्वेत शुक्ला. मैनपाट/सरगुजा.
82 साल की पेमा के चेहरे में पड़ी झुर्रियां सिर्फ उम्र का बखान नहीं कर रही, बल्कि यह चिंता और मायूसी की सिलवटें हैं जो उम्र के अंतिम पड़ाव में अपनो से दूर रहने की पीड़ा भोगने के कारण पड़ी हैं। उसकी आंखों में अपनी बेटी के विदेश में बसने की खुशी है तो अगले ही पल में उससे दूर रहने का दर्द भी है। वो बेटी के विदेश जाने के बाद यहां बने ओल्डेज होम में जीवन के अंतिम दिन बिता रही है। पेमा कहती हैं पहले देश छूटा फिर यहां जीवन आबाद होने लगा तो अब बच्चे हमसे दूर हो रहे हैं।


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केम्प में संचालित वृद्धाश्रम की केयर टेकर डोलमा कहतीहै कि यहां बहुत सारे ऐसे मातापिता है जिनके बच्चे यूरोपियन देशों में जाकर बस गए हैं। वही सोमू यांग कहती है कि बच्चों को अपने से दूर भेजना ही पड़ता है यहां रहकरवे उच्च शिक्षित नहीं हो पाएंगे। शिक्षा ही हमारे जीने का सहारा है। यह ओल्डेज होम तिब्बत से आकर 53 साल पहले बसे छत्तीसगढ़ के मिनी तिब्बत की तस्वीर है उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए विदेश जाने बाद यहां बुजुर्ग तिब्बतियों का आश्रम बनता जा रहा है।


मैनपाट की पहाडिय़ों में बना शरणार्थी तिब्बतियों का बसेरा अब धीरे धीरे उम्रदराज लोगों का ठिकाना बनता जा रहा है। उच्च शिक्षा की कमी और रोजगार की तलाश में तिब्बती लड़के और लड़कियां यहां से पलायन कर अन्य प्रदेशों और विदेश का रूख कर रहे हैं। यहां रहने वाले समाजिक कार्यकर्ता त्रिलोकी यादव कहते हैं कि केम्पों में अब युवा कम ही दिखाई पड़ रहे हैं। शरणार्थी तिब्बतियों के केम्प में अधिकतर वृद्ध मां बाप ही रह रहे हैं। हर साल लगभग 15 से 20 लड़के और लड़कियां उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं।


प्रदेश की धरती पर जन्मी प्रतिभाएं विदेशों में जाकर अपना जौहर दिखा रही हैं जबकि प्रदेश में अवसर दिया जाना तो निश्चित ही वे प्रदेश का नाम गौरवन्वित कर सकती हैं। प्रदेश की धरोहर मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण ही यहां से जाने को मजबूर है। 82 साल की पेमा के अनुसार हमारी बेटी शिंगसोनो को हायर एजुकेशन के लिए यहां से जाना पड़ा अब रोजगार के लिए अमेरिका में सैटल हो गई है। पहले घर से बेघर होने का दंश झेला अब बुढ़ापे में बच्चों से दूर रहने का दर्द भी झेलरहे हैं। यह दर्द सिर्फ पेमा का नहीं है, बल्कि 1969 में चीन की दहशत गर्दी से बचकर छत्तीसगढ़ आए सभी तिब्बती शरणार्थियों की एक जैसी दास्तान है।