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इस जिले के किसानों ने दिखाई हिम्मत, मिलकर कर रहे दलहन की खेती

दलहन की फसलों के लिए अधिक पानी की भी आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने बताया कि इस बार जहां पूरा जिला सूखे की चपेट में है, वहीं प्रति बीघा मूंग की तीन क्विंटल तक उपज दर्ज की गई है। इसी प्रकार अरहर की फसल में भी अच्छे मुनाफे का अनुमान लगाया जा रहा है।

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Anwar Khan

Dec 22, 2015


भिंड। परंपरागत खेती की बजाय अब जिले के किसानों का रुख दलहन की खेती की ओर है। वर्ष 2013 में 50 से अधिक हेक्टेयर, 2014 में 95 हेक्टेयर व 2015 में 150 हेक्टेयर से अधिक जमीन पर दलहन की फसल तैयार की गई है। भिण्ड जिले के अकोड़ा, रूर, मोतीपुरा, बिलाव, ऊमरी, गेहवत, देवगढ़, किटी, खरिका, खेरा श्यामपुरा, मेंहदा सहित दो दर्जन से ज्यादा गांवों के करीब पांच सौ किसानों ने दलहन की खेती करना शुरू कर दिया है।

किसानों के लिए दलहन की फसल कम लागत में अधिक मुनाफेदार साबित हो रही है। भिण्ड, रौन, मेहगांव व लहार क्षेत्र के किसानों ने दलहन की फसल की ओर रुख करने की पहल की है। साल दर साल बढ़ रहे दलहन की फसल के रकबे के अनुसार अगले दो वर्ष में दलहन की खेती 700 से एक हजार हेक्टेयर में होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

कम लागत और कम पानी में तैयार
अकोड़ा निवासी रनवीर सिंह यादव, रुकम सिंह कुशवाह, ऊमरी निवासी अविलाख सिंह यादव, सत्यवीर सिंह, मेंहदा निवासी सोबरन सिंह, रामनारायण शर्मा, खरिका निवासी अंगद सिंह, प्रमोद बघेल, रूर निवासी रतीराम जाटव, मातादीन कुशवाह आदि किसानों ने बताया कि परंपरागत खेती की अपेक्षा दलहन की फसल कम लागत में तैयारी हो जाती है। दलहन की फसलों के लिए अधिक पानी की भी आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने बताया कि इस बार जहां पूरा जिला सूखे की चपेट में है, वहीं प्रति बीघा मूंग की तीन क्विंटल तक उपज दर्ज की गई है। इसी प्रकार अरहर की फसल में भी अच्छे मुनाफे का अनुमान लगाया जा रहा है।

जिनके पास कम खेती उनके दिन फिरे
रौन निवासी रामदयाल सिंह राजपूत के अनुसार उनके पास दो बीघा पैतृक जमीन है, जिसमें परंपरागत खेती से उनका घर खर्च निकलना भी मुश्किल हो रहा था। बीते दो साल से वह मूंग व अरहर की फसल ले रहे हैं, जिसमें न केवल परिवार का लालन-पालन ठीक से होने लगा है बल्कि भविष्य के लिए कुछ बचत भी शुरू कर दी है।

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