अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर बांके बिहारी के चरणों के होते हैं दर्शन, मिलती है विशेष कृपा

अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर बांके बिहारी के चरणों के होते हैं दर्शन, मिलती है विशेष कृपा

Tanvi Sharma | Publish: May, 03 2019 12:56:40 PM (IST) | Updated: May, 03 2019 12:56:41 PM (IST) मंदिर

अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर बांके बिहारी के चरणों के होते हैं दर्शन, मिलती है विशेष कृपा

देश के प्रमुख मंदिरों में से एक बांके बिहारी मंदिर बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित हैं। यहां वैसे तो सालभर ही भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन कुछ विशेष अवसरों या त्यौहारों पर यहां बहुत अधिक भीड़ रहती है। जैसे होली, कृष्ण जन्माष्टमी, अक्षय तृतीया आदि। वहीं 7 मई 2019 को अक्षय तृतीया आऩे वाली है इस मौके पर भक्तों का भारी जमावड़ा मंदिर में देखने को मिलेगा क्योंकि अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर बांके बिहारी मंदिर में बांके बिहारी जी के चरणों के दर्शन होते हैं। वैसे तो सालभर यहां बिहारी जी के चरण वस्त्रों और फूलों से ढ़के रहते हैं। लेकिन इस दिन कान्हा के चरणों के दर्शन करने से भक्तों को विशेष कृपा प्राप्त होती है।

 

banke bihari mandir

अद्भुत है यहां की मूर्ति

बांके बिहारी जी के मंदिर में राधा और श्री कष्ण की मूर्ति बहुत ही अद्भुत व आकर्षित है। यहां राधा और कृष्ण का सम्मिलित रुप है। माना जाता है कि स्‍वामी हरिदासजी ने इन्‍हें अपनी भक्ति और साधना की शक्ति से प्रकट किया था। बांके बिहारीजी के श्रृंगार में आधी मूर्ति पर महिला और आधी मूर्ति पर पुरुष के स्‍वरूप का श्रंगार किया जाता है।

भगवान के लिए मंगवाया जाता है विशेष चंदन

अक्षय तृतीया के दिन भगवान के पूरे शरीर पर चंदन का लेप किया जाता है। भगवान के लिए यह विशेष चंदन दक्षिण भारत से मंगवाया जाता है और उसे कई महीनों पहले घिसना शुरू कर दिया जाता है। अक्षय तृतीया से एक दिन पहले चंदन में कपूर, केसर, गुलाबजल, यमुनाजल और इत्रों को मिलाकर लेप तैयार कर लिया जाता है। फिर अक्षय तृतीया के दिन श्रृंगार से पहले भगवान के पूरे शरीर पर इसका लेप लगाया जाता है।

 

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अक्षय तृतीया को लेकर प्रचलित है यह कथा

एक बार वृंदावन में एक संत अक्षय तृतीया के दिन बांके बिहारीजी के चरणों का दर्शन करते हुए श्रद्धा भाव से गुनगुना रहे थे-श्री बांके बिहारीजी के चरण कमल में नयन हमारे अटके। एक व्‍यक्ति वहीं पर खड़ा होकर यह गीत सुन रहा था। उसे प्रभु की भक्ति का यह भाव बहुत पसंद आया। दर्शन करके वह भी गुनगुनाते हुए अपने घर की ओर बढ़ गया। भक्ति भाव में लीन इस व्‍यक्ति की गाते-गाते कब जुबान पलट गई, वह जान ही नहीं पाया और वह उल्‍टा गाने लगा- बांके बिहारी जी के नयन कमल में चरण हमारे अटके।

उसके भक्तिभाव से प्रसन्‍न होकर बांके बिहारी प्रकट हो गए। प्रभु ने मुस्‍कुराते हुए उससे कहा, अरे भाई मेरे एक से बढ़कर एक भक्‍त हैं, परंतु तुझ जैसा निराला भक्‍त मुझे कभी नहीं मिला। लोगों के नयन तो हमारे चरणों में अटक जाते हैं परंतु तुमने तो हमारे नयन कमल में अपने चरणों को अटका दिया। प्रभु की बातों को वह समझ नहीं पा रहा था, क्‍योंकि वह प्रभु के निस्‍वार्थ प्रेम भक्ति में डूबा था। मगर फिर उसे समझ आया कि प्रभु तो केवल भाव के भूखे हैं। उसे लगा कि अगर उससे कोई गलती हुई होती तो भगवान उसे दर्शन देने न आते। प्रभु के अदृश्‍य होने के बाद वह खूब रोया और प्रभु के दर्शन पाकर अपने जीवन को सफल समझने लगा। मान्‍यता है कि तब से अक्षत तृतीया के दिन बांके बिहारी के चरणों के दर्शन की परंपरा शुरू हुई।

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