इस तालाब में साक्षात दिखाई देते हैं भगवान विष्णु, दर्शन के लिए उमड़ती है भक्तों की भीड़

इस तालाब में साक्षात दिखाई देते हैं भगवान विष्णु, दर्शन के लिए उमड़ती है भक्तों की भीड़

Tanvi Sharma | Publish: Jan, 30 2019 03:05:36 PM (IST) | Updated: Jan, 30 2019 03:05:37 PM (IST) मंदिर

इस तालाब में साक्षात दिखाई देते हैं भगवान विष्णु, दर्शन के लिए उमड़ती है भक्तों की भीड़

देशभर में कई अद्भुत व आकर्षक मंदिर हैं जिनकी सुंदरता किसी भी व्यक्ति को अपनी तरफ खींच सकती है। उन्हीं मंदिरों में से एक मंदिर नेपाल के काठमांडू से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। नेपाल के शिवपुरी में स्थित विष्णु जी का मंदिर बहुत ही सुंदर व सबसे बड़ा मंदिर है। मंदिर अपनी नक्काशियों के लिए बहुत प्रसिद्ध है, यहां स्थापित मंदिर बुढ़ानिलकंठ मंदिर नाम से जाना जाता है। मंदिर में श्री विष्णु की सोती हुई प्रतिमा विराजित है। जो की लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

 

vishnu mandir

मंदिर में विराजमान है भगवान विष्णु की शयन प्रतिमा

बुढ़ानिलकुंठ मंदिर में भगवान विष्णु की शयन प्रतिमा विराजमान है, मंदिर में विराजमान इस मूर्ति की लंबाई लगभग 5 मीटर है और तालाब की लंबाई करीब 13 मीटर है जो की ब्रह्मांडीय समुद्र का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान विष्णु की इस प्रतिमा को बहुत ही अच्छे से बनाया व दर्शाया गया है। तालाब में स्थित विष्णु जी की मूर्ति शेष नाग की कुंडली में विराजित है, मूर्ति में विष्णु जी के पैर पार हो गए हैं और बाकी के ग्यारह सिर उनके सिर से टकराते हुए दिखाए गए हैं। विष्णु जी की इस प्रतिमा में विष्णु जी चार हाथ उनके दिव्य गुणों को बता रहे हैं, पहला चक्र मन का प्रतिनिधित्व करना, एक शंख चार तत्व, एक कमल का फूल चलती ब्रह्मांड और गदा प्रधान ज्ञान को दिखा रही है।

मंदिर में अप्रत्यक्ष रूप से विराजमान है भगवान शिव

इस मंदिर में भगवान विष्णु प्रत्यक्ष मूर्ति के रूप में विराजमान हैं वहीं भगवान शिव पानी में अप्रत्यक्ष रूप से विराजित हैं। बुदनीलकंठ के पानी को गोसाईकुंड में उत्पन्न माना जाता है और यहां लोगों का मानना है कि अगस्त में होने वाले वार्षिक शिव उत्सव के दौरान झील के पानी के नीचे शिव की एक छवि देखी जा सकती है।

 

vishnu mandir

पौराणिक कथा के अनुसार मंदिर का महत्व

पौराणिक कथा के अनुसार जब समुद्र मंथन के समय समुद्र से हलाहल यानि विष निकला तो सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए इस विष को शिवजी ने अपने कंठ में ले लिया और तभी से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ा। जब जहर के कारण उनका गला जलने लगा तो वे काठमांडू के उत्तर की सीमा की ओर गए और एक झील बनाने के लिए अपने त्रिशूल के साथ पहाड़ पर वार किया और इस झील के पानी से अपनी प्यास बुझाई, इस झील को गोसाईकुंड के नाम से जाना जाता है।

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned