इस मंदिर के एक ही ​स्थान पर हर 12 साल में होता है वज्रपात, लेकिन कारण कोई नहीं जानता

खंडित होने के कुछ समय बाद फिर जुड़ जाता है शिवलिंग, कहलाते हैं बिजली महादेव...

By: दीपेश तिवारी

Published: 01 Sep 2020, 08:03 AM IST

देश में यूं को भगवान शंकर के कई मंदिर है। जिनमें कई अत्यंत चमत्कारी हैं, तो कुछ को तो आज भी जागृत माना जाता है। इन्हीं मंदिरों में से एक रहस्यमयी शिव मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी है, जिसकी गुत्थी आज तक कोई नहीं सुलझा पाया। इस मंदिर में भगवान शिव की एक पिंडी मौजूद है। और इस मंदिर के संबंध में सबसे खास बात तो यह है कि इस पर हर 12 साल में आकाशीय बिजली गिरती है, लेकिन इसके बाद भी मंदिर को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होता।

कुल्लू में स्थिति यह मंदिर ऊंची पहाड़ियों पर पार्वती और व्यास पार्वती और व्यास नदी का संगम पर है। हर 12 साल में यहां बिजली गिरने के चलते ही इस शिवलिंग को बिजली महादेव के नाम से जाना जाता है। वहीं इस शिवलिंग को स्थानीय लोग मक्खन महादेव कहते हैं तो कुछ लोग इसे बिजली महादेव का शिवालय भी कहते हैं। भोलेनाथ का यह शिवलिंग कुल्लू से 18 किलोमीटर की दूरी पर मथान नामक स्थान पर स्थित है। यह जगह समुद्र स्तर 2450 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। शीत काल में यहां भारी बर्फबारी भी होती है।

ऐसे पहुंचते है मंदिर...
मंदिर तक पहुंचने के लिए कठिन चढ़ाई चढ़नी होती है। यहां का मुख्‍य आकर्षण 100 मी. लंबी ध्वज़(छड़ी) है। इसको देखकर ऐसा ल्रगता है मानो यह सूरज को भेद रही हो। इस ध्वज़ (छड़ी) के बारे में कहा जाता है बिजली कड़कने पर इसमें जो तरंगे उठती है वे भगवान का आशीर्वाद होता है। मंदिर के इसी ध्वज पर लग़भग हर साल बिजली गिरती है।

आइये जानते हैं सदियों से चले आ रहे बिजली गिरने के इस रहस्य के बारे में कुछ रोचक बाते...
पौराणिक कथा के अनुसार पूरी कुल्लू घाटी एक विशालकाय सांप का रूप है। इस सांप का वध भगवान शिव ने किया था। मान्यता के अनुसार, भगवान शिव की आज्ञा लेकर ही हर 12 साल में भगवान इंद्र भोलेनाथ की आज्ञा लेकर बिजली गिराते हैं। बिजली के गिरने से मंदिर का शिवलिंग खंडित हो जाता है। इसके बाद मंदिर के पूजारी खंडित शिवलिंग पर मरहम के तौर पर मक्खन लगाते हैं, जिससे की महादेव को दर्द से राहत मिले।

ऐसे समझें इस रहस्य की कहानी...
पौराणिक कथा के अनुसार, इस मंदिर में कुलान्त नाम का एक मायावी दैत्य रहा करता था। एक बार उसने सारे जीवों को मारने के लिए व्यास नदी का पानी रोक दिया था। यह देख महादेव क्रोधित हो गए। इसके बाद महादेव ने एक माया रची। भगवान शिव दैत्य के पास गए और उसे कहा कि उसकी पूंछ में आग लगी है। ऐसे में जैसे ही दैत्य पूंछ देखने के लिए पीछे मूड़ा, भगवान शिव ने अपने त्रिशुल से दैत्य के सिर पर वार कर दिया और इस तरह कुलान्त मारा गया। कहा जाता है कि उसके विशालकाय शरीर एक पहाड़ में बदल गया, जिसे आज हम कुल्लू के पहाड़ कहते हैं।

बिजली गिरने की ये है मान्यता...
कथा के अनुसार, जब भगवान शिव ने कुलान्त दैत्य को मार दिया, उसके बाद उन्होंने इन्द्र से कहा कि वे हर 12 साल पर बिजली गिराएं। बिजली गिरने से शिवलिंग टूट जाता है, जिसे यहां के पूजारियों द्वारा इसे मक्खन से ठीक कर दिया जाता है, जो बाद में कठोर हो जाता है।

शिवलिंग पर ही क्यों गिरती है बिजली
कथा के अनुसार भगवान शिव ने कुलान्त का वध करने के बाद इन्द्र से कहा कि वह हर 12 सल में वहां बिजली गिराएं। ऐसा करने के लिए भगवान शिव ने इसलिए कहा जिससे जन-धन की हानि न हो। कहा जाता है कि यहां भगवान खुद बिजली के झटके को सहन कर अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।

निश्चित दिननों में गिरती है बिजली?
इस मंदिर को लेकर यह भी खास बात है कि जहां एक ओर मंदिर पर हर 12 साल में बिजली गिरती है, वहीं ये बिजली साल सावन महीने में ही गिरती है। बिजली गिरने से मंदिर समेत पूरे गांव को नुकसान होता है मगर फिर भी शिव जी पूरे गांव की रक्षा करते हैं। यह मंजर बारह साल में एक बार देखने को मिलता है।

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दीपेश तिवारी
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