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2007 में 165 करोड़ देकर सरकार से खरीदी थी जमीन, नहीं मिला कब्जा तो सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया ऐतिहासिक फैसला

supreme court dda refund: सुप्रीम कोर्ट ने DDA को 165 करोड़ रुपये ब्याज समेत लौटाने का आदेश दिया है। जानिए वो कंपनी का पूरा मामला जिसने 2007 में नीलामी में जमीन खरीदी लेकिन डीडीए का अधिग्रहण लैप्स हो गया।

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भारत

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Mukul Kumar

May 09, 2026

Court Judgement

Court Judgement: प्रतीकात्मक तस्वीर- (पत्रिका)

एक कंपनी ने साल 2007 में दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) की नीलामी में कमर्शियल प्लॉट खरीदने के लिए 165 करोड़ रुपये दिए।

स्टैंप ड्यूटी भरी, प्रॉपर्टी टैक्स लगातार चुकाती रही। लेकिन दस साल बाद पता चला कि डीडीए ने जो जमीन बेची है, वो असल में उसकी थी ही नहीं।

2026 तक उस जमीन पर कंपनी को कब्जा नहीं मिल पाया। अंत में कंपनी ने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने डीडीए को पूरा पैसा ब्याज समेत लौटाने का आदेश दे दिया है। यह फैसला उन हजारों लोगों के लिए राहत भरा संदेश है जो सरकारी नीलामी में भरोसा करके प्रॉपर्टी खरीदते हैं।

क्या था पूरा मामला?

2007 में डीडीए ने नीलामी कर कंपनी को प्लॉट अलॉट किया। कंपनी ने भरोसे के साथ पैसे जमा किए। लेकिन असली मालिक सिमला देवी ने 2015 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की कि सरकार ने उन्हें मुआवजा ही नहीं दिया, इसलिए अधिग्रहण रद्द हो जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने 2016 में और सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में इसे सही माना। जिसके आधार पर अधिग्रहण रद्द हो गया, जमीन वापस सिमला देवी को लौट हो गई। कंपनी को इसकी भनक तक नहीं थी। जब डीडीए ने कंपनी से नया अधिग्रहण कराने के लिए दोबारा पैसे मांगे, तब सच्चाई सामने आई। क्योंकि कंपनी से दोबारा पैसे मांगे जा रहे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

29 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा- जब सरकार की अधिग्रहण प्रक्रिया ही फेल हो जाती है, तो खरीदार को पूरा पैसा ब्याज समेत वापस मिलना चाहिए। इस पर डीडीए ने दलील दी कि पहले कब्जा लौटाओ, तब रिफंड देंगे। कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

कोर्ट का कहना था कि अब जमीन पर डीडीए का कोई हक नहीं बचा है। खरीदार ने विश्वास के साथ नीलामी में जमीन खरीदी थी, इसलिए उसे दोबारा परेशान नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने 164.91 करोड़ रुपये पर 7.5 प्रतिशत सालाना ब्याज जुलाई 2007 से देने का आदेश दिया। डीडीए पहले ही हाई कोर्ट में 186 करोड़ जमा कर चुका था, अब उसे तुरंत कंपनी को निकालने की इजाजत है। बाकी रकम आठ हफ्तों में चुकानी होगी।