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मां काली के इस मंदिर में अमावस्या पर आती है डायन, होती है भक्तों की हर मुराद पूरी

मां काली के इस मंदिर में अमावस्या पर आती है डायन, होती है भक्तों की हर मुराद पूरी

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भोपाल

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Tanvi Sharma

Dec 02, 2018

pohlani devi mandir

आस्था के द्वार माता पोहलानी का मंदिर डलहौजी में डैनकुंड की खुबसूरत वादियों में बसा हुआ है। माता के इस दरबार में लोगों की भारी आस्था जुड़ी हुई है। हिमाचल प्रदेश के जिला चंबा के डलहौजी से 12 km की दूरी पर खूबसूरत वादियों के बीच स्थित इस मंदिर में मां काली का रुप पोहलानी स्थापित है। पोहलानी देवी पहलवानों की देवी कही जाती हैं। वैसे तो यहां हमेशा ही भक्तों का तांता देवी दर्शन के लिए लगा रहता है लेकिन नवरात्रि के मौके पर यहां अथाह भीड़ देखने को मिलती है। भक्त यहां अपनी मुरादें लेकर आते हैं उनका मानना है की यहां आने वाले हर भक्त की मन्नत पूरी जरुर होती है। मन्नत पूरी होने पर भक्त देवी को धन्यवाद देने भी आते हैं। मंदिर से काफी लोगों की आस्‍था जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है कि हजारों वर्ष पहले इस डैनकुण्ड की पहाड़ी के उस मार्ग से कोई भी नहीं आ जाता था, क्योंकि इस पहाडीं पर राक्षसों का वास था। माता काली जी ने पहलवान के रुप में आकर उन राक्षसों का संहार किया तब से इस मंदिर का नाम पोहलवानी पड़ा। कहते है डेनकुण्ड नामक जगह पर डायने रहती थी यंहा पर आज भी कुंड देखे जा सकते हैं। लोगों का मानना है कि डैन अमावस्या पर यहां आज भी डायने आती हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार

पौराणिक कथाओं के अनुसार लोगों पर बढ़ रहे अत्याचार को देखकर माता महाकाली से रहा नहीं गया और वह डैन कुंड की इन्ही पहाड़ियों पर एक बड़े से पत्थर से बाहर प्रकट हुई पत्थर के फटने की आवाज दूर दूर तक लोगों को सुनाई दी कन्या रूपी माता की हाथ में त्रिशूल था और यंही पर माता ने राक्षसों से एक पहलवान की तरह लड़ कर उनका वध किया तभी से यहाँ पर माता को पहलवानी माता के नाम से पुकारा जाने लगा। होवार के एक किसान को माता ने सपने में आकर कहा यहाँ पर माता का मंदिर स्थापित करने का आदेश दिया और उनके आदेशानुसार ही यहाँ पर माता के मंदिर की स्थापना की गई।

बेहतरीन पर्यटन स्थल है पोहलानी मंदिर

पोहलानी माता रखेड़ गांव के वाशिन्दों की कुल माता है इसके नजदीक खूबसूरत रखेड़ गांव पड़ता है जो काहरी पंचायत के अंदर आता है। यंही के लोगो की कमेटी मंदिर की देख रेख करती है। यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के उत्तर पश्चिम भाग में 2200 मीटर की उंचाई पर स्‍थित है। गमियों जहां पर्यटक यहां की ठण्डी हवाओं का लुप्त उठाते है तो वहीं सर्दी के मौंसम में बर्फ से ढ़के पहाडों का नजारा देखते ही बनता है। सर्दियों में ये मंदिर और इसके आसपास वर्फ़ की मोटी चादर बिछ जाती है, जिससे नजारा बहुत ही मनमोहक हो जाता है। दूर दूर तक वर्फ़ ही नज़र आती है उस समय यहां पंहुचना बहुत कठिन हो जाता है। यहां से चारों ओर का नजारा दिखाई देता है।