
डायवर्सन के बिना कॉलोनियां, नामांतरण ठप और राजस्व विभाग बेपरवाह
टीकमगढ़ जिले में खेती का रकबा लगातार सिमट रहा है, लेकिन सरकारी कागजों में आज भी वही जमीन कृषि योग्य दर्ज है। खेतों में हल की जगह अब प्लॉटिंग मशीनें चल रही है। फ सल की जगह मकान खड़े हो रहे है। फि र भी राजस्व रिकॉर्ड में कोई बदलाव नहीं। यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक मिलीभगत प्लाटिंग के कार्य किए जा रहे है।
नगर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक कृषि भूमि पर बिना डायवर्सन कॉलोनियां काटी जा रही है। रजिस्ट्रियां धड़ल्ले से हो रही है। शासन को राजस्व भी मिल रहा है, लेकिन नामांतरण और भूमि उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया जानबूझकर लटकाई जा रही है। पीडि़तों ने बताया कि जब रजिस्ट्री हो रही है, पैसा सरकारी खजाने में जा रहा है। तो फि र नामांतरण क्यों नहीं हो रहा है।
कलेक्टर द्वारा 16 अप्रेल 2025 को स्पष्ट आदेश जारी किया गया था कि नामांतरण प्रकरणों में आवेदकों से 1915 की नकल की मांग न की जाए और गैर शासकीय भूमि के नामांतरण पटवारी रिपोर्ट के आधार पर किए जाएं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन आदेशों को तहसीलों में फ ाइलों तक सीमित कर दिया गया। जतारा तहसील में ही करीब 200 से अधिक प्रकरण लंबित है, कई मामलों में आवेदन सीधे निरस्त कर दिए गए।
किसान और जमीन मालिक सालों से तहसील कार्यालयों के चक्कर काट रहे है। किसान महेंद्र कुमारए काशीराम और कल्याण सिंह चंदेल बताते है कि दो साल से ज्यादा समय बीतने के बाद भी उनकी जमीन का नामांतरण नहीं हो पाया। आलोक कुमार, देवी सिंह और रामप्रसाद का कहना है कि हर पेशी पर नया बहाना मिलता है। कभी अधिकारी नहीं मिलते, कभी तारीख बढ़ जाती है।
नामांतरण, बंटवारा और सीमांकन के प्रकरण लंबित रहने से न केवल किसान परेशान है, बल्कि शासन की भूमि नीति और खाद्य सुरक्षा पर भी सवाल खड़े हो रहे है। खेती का रकबा घटता रहा और रिकॉर्ड नहीं सुधरा, तो आने वाले समय में जमीन विवाद, कोर्ट केस और प्रशासनिक अराजकता तय मानी जा रही है।
शासन के नियमों के अनुसार ही नामांतरण की प्रक्रिया की जा रही है। जहां बिना डायवर्सन के प्लाटिंग हुई है तो उन मामलों की जांच कर प्रकरण चिन्हित किए जाएंगे और कार्रवाई की जाएगी।
Published on:
07 Jan 2026 11:34 am
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