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क्रिकेट vs रामकथा के दर्शक: कभी नहीं सुना होगा ऐसा वर्णन, पढि़ए क्या है सार…

पतित पावन केवल राजाराम नही, सद्गुरु भी होते है। शास्त्र के वश में जीने से आनंद है। गुरू के वश में जीना, परम स्वतंत्रता है। गुरु किसी से डरता नही है।

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Cricket vs Ramakatha viewers at morari bapu satsang in orchha

Cricket vs Ramakatha viewers at morari bapu satsang in orchha

टीकमगढ़.पतित पावन केवल राजाराम नही, सद्गुरु भी होते है। शास्त्र के वश में जीने से आनंद है। गुरू के वश में जीना, परम स्वतंत्रता है। गुरु ? किसी से डरता नही है। गुरु से डरना, डरना नही बल्कि मर्यादा, यह अभय देती है। साधु सुधारने नही, स्वीकार करने निकलता है। यह बात मुरारी बापू ने ओरछा में मानस राम राजा के चौथे दिन, सद्गुरु का महात्व प्रतिपादित करते हुए कहीं।

क्रिकेट से समझाया मानस: कथा में बापू ने क्रिकेट के माध्यम से मानस समझाया। उन्होंने कहा कि मैंच देखने बहुत से लोग जाते है। वह भी जाते है जो कुछ जानते नही। वहां पर बैठे रहते है। कुछ लोग सिक्स लगने पर नाचते है। कुछ तो इतने उत्साहित हो जाते है कि मैदान में जाकर नाचने लगते है। ऐसे ही रामकथा है। इसमें कुछ लोग सो जाते है, कुछ उत्साहित होकर नृत्य करते है। जो खेल के मैदान में उतर जाते है वहीं धन्य है। सुनकर कर्म में लग जाना, कथा का उद्देश्य है। संसार के मैदान में आकर गलत गेंद को छोड़ दो। निंदा-बाईड बाल है। इसे छोड़ दो। इसमें रन भी मिलेगा और दूसरी बाल भी। रामकथा के मैंच में यदि एक सूत्र वाक्य भी कैंच कर लिया तो समझों मैंच जीत लिया। यह रामकथा भी 9 दिवसीय टेस्ट मैंच है। हर बार रन बनाने पड़ते है कि गोस्वामी जी की टीम हार न जाए।

सद्गुरु गणेशदास जी भक्तमाली के जन्मशताब्दी महोत्सव के तहत आयोजित रामकथा के चौथे दिन बापू ने सद्गुरु का महात्व बातते हुए कहा कि चित्रकूट में जब लोग पंचदेव की पूजा करते है तो कहते है, कि गुरु समाज के साथ श्रीराम पधारे। यह गुरु की महिमा की। यह मानस भी ऐसे ही गुरु के लिए हो रही है। उन्होंने बताया कि एक बार गणेशदास जी भक्तमाली के पास एक शराबी आया और बोला कि आप ठीक है। और सब अच्छा है। तो भक्तमाली जी ने कहा कि हां सब अच्छा है। उनके साथ उपस्थित लोगों ने कहा कि महाराज यह शराबी आपके पास कैसे आया? इसके मुंह से बदबू आ रही थी, और आपने कुछ नही कहा। तब भक्तमाली जी ने कहा कि इसमें कुछ तो होगा, जब यह मेरे पास आया। यह होते सद्गुरु साहब। साधु सुधारता नही, स्वीकार करता है। स्वीकार करने से सुधार होता है। गणेशदास जी सनातनी महापुरुष है। मैं इनके भजन और तपस्या का अंदाजा लगा सकता हूं। यह सिद्धांत तोडऩे नही, नया सिद्धांत बनाते है। यह सिद्धांत वर्षों तक विश्व को मार्ग दिखाते है।
ईशु और गांधी का दिया उदाहरण: बापू ने पतितों को स्वीकार करने के लिए ईशु और गांधी का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि किस तरह लोगों द्वारा जब एक बाजारू औरत को पत्थरों से मारा जा रहा था तो ईशु ने उसे यह कह कर बचा लिया कि पत्थर वही मारे जिसने कभी मन, वचन और नेत्र से भी पाप न किया हो और लोगों ने पत्थर छोड़ दिए। वहीं मोरारी बापू ने बताया कि किस प्रकार से लखनऊ के अधिवेशन मे गए गांधी जी ने राष्ट्रोत्थान के लिए एक नगरवधु की सोने की चूडिय़ा, यह कह कर स्वीकार की कि, बेटा तेरे आत्म निवेदन को मैं प्रणाम करता हूं। इसके बाद उस महिला यह पेशा छोड़ दिया था।
वह कुल धन्य हो जाता है...: बापू ने विभिषण के लंका से जाने का प्रसंग सुनाते हुए भगवत भक्ति के महात्व को बताया। उन्होंने कहा कि विभीषण विमान से श्रीराम के पास पहुंचे, जबकि सेतु बन चुका था। वह उससे नही गए। क्यों की उसमें देरी होती। वहीं रावण ने भी उसे नही रोका, कि यह दुश्मन के पास जा रहा है। मेरा मानना है कि जब शरणागति लेनी हो, तो देरी नही करनी चाहिए। वहीं रावण भी यह चाहता था कि यदि मेरा एक भाई भी हरि की शरण में पहुंच जाए तो पूरा परिवार तर जाएगा। उन्होंने बुद्ध की एक कथा सुनाते हुए कहा कि यदि किसी घर में चोर, चोरी करने की नियत से जाए और वहां एक बालक भी नींद में धीरे-धीरे रोता रहे तो चोर घर में प्रवेश नही करता। यदि एक ज्योति भी जल रही हो तो भी चोर हिम्मत नही करता। बापू ने कहा कि इसी प्रकार यदि घर में कोई बालक भी राम राम की ज्योति से जाग्रत हो जाए, तो पूरा कुल धन्य हो जाता है।

87 हजार वर्ष की समाधि का फल है राम: इसके बाद बापू ने रामकथा का प्रारंभ करते हुए कहा कि शिव और सति कुभंज ऋषि के पास रामकथा सुनने जाते है। कुभंज ऋषि शिव और सति का पूजन करते है। इससे सति को कुभंज ऋषि के प्रति शंका उत्पन्न होती है और वह मन से कथा नही सुनती है। कथा के बाद जब वह वापस कैलाश पर जाते समय, त्रेता युग होने से भगवान राम की लीला देख, सती के मन में शंका होती है और वह उनकी परीक्षा लेने, जानकी के रूप में उनके सम्मुख पहुंचती है। जब शिव को इसका पता चलता है तो वह मन में सती का परित्याग कर देते है। इसके बाद वह समाधी में लीन हो जाते है। 87 हजार वर्ष की समाधी के बाद जब शिव जागते है तो राम का उदघोष करते है और सती को रामकथा सुनाना प्रारंभ करते है। बापू कहते है कि शिव की 87000 वर्ष की तपस्या का फल है राम।
यह भी बोले बापू: कथा का प्रारंभ बापू ने प्रेम नगर की गहरी डगरिया, लाखो लोग डुबाना मुसाफिर से की। बापू ने कहा कि मुझे पता नही ओरछा में आकर मैं कहां जा रहा हूं। यह प्रेम नगर है। यह प्रेम सभा है।
- मानस में 10 बार राजा शब्द आया है। तुलसीदास जी को प्रयाग में श्रीरामराजा की अनुभूति हुई। इसलिए इसे तीर्थराज की उपाधी दी गई है।
- मानस में भक्त, भक्ति, भगवंत और गुरू को एक माना गया है।
- क्रिसमस मनाओं, सांता क्लॉज को बुलाओं, लेकिन रामनवमीं पर बच्चें को सजा कर श्रीराम की आरती कराओं। घर में वशिष्ट, बाल्मीकि, कबीर, मलूकदास जी को बुलाओ।
- रामचरित मानस ही पूरे विश्व को सत्य, प्रेम और करूणा सिखाता है।
- ओरछा के आयोजन को देखकर इंद्र भी ईष्र्या कर रहे होंगे। ओरछा में यह और अच्छा क्या हो रहा है।
सुनाई शायरी: बापू चौथे दिन पूरी तरह से गाने के मूढ में रहे। उन्होंने कुछ शायरियां भी सुनाई।
मुझे फंूकने से पहले, मेरे दिल पे हाथ रखना
ये किसी की अमानत है, कहीं साथ जल न जाए।
मुझे सूली पर चढ़ाने की जरूरत ही क्या है,
मेरे हाथ से कमल छीन लो, मै मर जाऊंगा।
ऐ सच है कि तुने मुझे चाहा ही बहुत है
लेकिन मेरी आंखों ने रूलाया भी बहुत है।
जो बांटता फिरता है, जमाने में उजाले
उस शख्स के जीवन में अंधेरा भी बहुत है।
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