
Four to five thousand rupees costs
टीकमगढ़.महानगरों में भले ही आधुनिकता की होड़ लगी हो लेकिन गांवों में आज भी परम्पराएं निभाई जाती हैं। खासकर सांस्कृतिक परम्पराएं गांवों में पीढिय़ों से सहेजी जाती रही हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्र के ज्यादातर लोग खेती-बाड़ी या फिर मवेशी पालन कर अपने परिवार का गुजर बसर करते हैं। मानसून के दिनों में जिस तरह किसान इंद्रदेव की पूजा-अर्चना करते हैं उसी तरह बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में किसान मवेशियों की अच्छी देखभाल के लिए परम्परागत वाद्य यंत्र डोरू (ढाक) बजाकर लोकदेवता कारस देव की आराधना करते हैं। पीतल से बनाए गए इस डोरू को बजाकर लोक गायक खुशहाली की कामना करते हैं। डोरू गायक ६५ वर्षीय बालू पाल ने बताया कि डोरू की आवाज रात में तीन से चार किलोमीटर तक सुनी जा सकती है। कुड़ैला (घुवारा) निवासी बालू पाल ने बताया कि आज भी बुंदेलखंड के गांवों में लोग पूरी आस्था के साथ गायन कर आराधना करते हैं। टीकमगढ़ में डोरू बनाने वाले रामभरोसे सोनी (कटेरा वाले) के यहां पहुंचे डोरू की विशेष परख रखने वाले बालू पाल बताया कि पहले यह डोरू चार-पांच किलोग्राम पीतल के बनाए जाते थे। समय के साथ महंगाई के कारण अब डेढ़ से दो किलो पीतल के ही डोरू बनाए जा रहे हैं।
गोट गायन
इस वाद्य यंत्र डोरू का उपयोग गोट गायन में होता है। बालू पाल ने बताया कि मन्नत पूरी हो जाने पर किसान अपने यहां इस पारम्परिक डोरू गायन का आयोजन करवाते हैं। इस गायन में पंद्रह से बीस लोग गायकी में साथ देते हैं जबकि मुख्य लोकगीत गायक डोरू बजाते हैं। जिस किसान के यहां यह आयोजन होता है वह पूरी आस्था व श्रद्धा से इसकी व्यवस्था भी करते हैं। उन्होंने बताया कि गोट का आयोजन लगभग २४ घंटे का होता है। दिन रात डोरू के धुन पर गायकी चलते रहती है। वहीं पूरे आयोजन समापन पर कन्या भोज व भंडारे का भी रिवाज है। उन्होंने बताया कि लोकदेवता कारस देव का जन्मस्थल झांझ (दतिया के निकट) है। वहीं से यह परम्परा बुंदेलखंड के गांवों तक पहुंची।
पिता से सीखा
डोरू गायक बालू पाल ने बताया कि उसने अपने पिता से डोरू गायन की कला सीखी। पिता ने दादा से इस गायकी की बारीकी सीखी। उन्होंने बताया बुंदेलखंड के गांवों में आज भी नई पीढ़ी के युवक डोरू गायन में रुचि लेते हैं। उन्होंने बताया कि कई युवा बेहतर डोरू गायन कर रहे हैं।
चार से पांच हजार रुपए तक आता है खर्च
पीतल को ढाल कर डोरू बनाने वाले रामभरोसे सोनी ने बताया कि विशेष तरह के मिट्टी व मोम के सांचे में ढालकर इसे बनाया जाता है। काफी मेहनत और बारीक काम है। दो भागों को अलग-अलग ढाला जाता है, फिर उसे विशेष तकनीकी व सावधानी के साथ जोड़ा जाता है। उन्होंने बताया कि जितनी बेहतर कारीगरी होगी उतनी ही दूर तक इसकी आवाज भी जाएगी। उन्होंने बताया कि दो किलोग्राम तक के डोरू का चार हजार रुपए तक मिल जाता है। इसके बाद फिर इस वाद्य यंत्र के दोनों तरफ खाल और घुंघरू लगवाने में करीब एक हजार और खर्च आता है।
Published on:
04 Dec 2020 06:00 am
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