
Historical fort of Aston lying neglected
टीकमगढ़. अस्तौन का एतिहासिक किला सन 1857 की क्रांति का गवाह है। ब्रिटिश सेना से हार जाने के बाद जब तात्या टोपे अपने कुछ खास सैनिकों के साथ भाग रहे थे तब उन्होंने यहां पर विश्राम किया गया था। आजादी की पहली क्रांति का गवाह यह किला आज अपने अस्तित्व बचाने के लिए लड़ रहा है।
अस्तौन का एतिहासिक किला वर्तमान में हर प्रकार से जर्जर हो गया है। इसकी दीवालों पर जहां तमाम पौधे उग आए है, वहीं चारों ओर से इस पर जंगली बेले चढ़ गई है। आलम यह है कि यह किला पूरे गांव का कचरा डालने का स्थान बन कर रह गया है। यह ऐतिहासिक किला न केवल लगभग 200 साल से अधिक पुराना है, बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह देश की स्वतंत्रता के लिए लड़े गए पहले युद्ध का गवाह है। यह सब होने के बाद भी इस किले को संरक्षित कराने के लिए आज तक किसी प्रकार का प्रयास नहीं किया गया है। यदि यही हाल रहा तो यह किला एक दिन जमींदोज हो जाएगा। इस किले की यह दुर्दशा देखकर अनेक लोग इसे संरक्षण की मांग कर चुके है। इसके बाद भी इस पर किसी का ध्यान नहीं है।
तात्या टोपे ने गुजारा समय
इतिहासकार पंडित हरिविष्णु अवस्थी बताते है कि 1857 की क्रांति में तात्या टोपे, झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ब्रिट्रिश फौज का सामना कर रहे थे। झांसी की रानी के बलिदान के बाद हमारे क्रांतिकारी भी तितर-बितर हो गए और क्रांति की इस अलख को जगाने के लिए सभी ने कुछ समय के लिए युद्ध से पीछे हटने का निर्णय लिया। ऐसे में टात्या टोपे अपने कुछ खास सिपहसालारों के साथ टीकमगढ़ होते ही निकले।
ऐसे में उनका सिंदवाहा के पास ब्रिटिश फौज से सामना हुआ तो उसे परास्त कर वह आगे बड़े। इस दौरान वह कुछ समय कुण्डेश्वर स्थित कोठी में रूके और फिर अस्तौन के किले में रहे। वहीं उनका लगातार पीछा कर रही ब्रिट्रिश फौज जब यहां आती दिखी तो वह यहां से भी निकल गए। वह बताते है उस समय तात्या टोपे का एक बस्ता एवं दो कटारे भी यहां छूट गए थे। इस बस्तें में उनके कुछ महात्वपूर्ण पत्र भी थे। यह पत्र वहां के किलेदार ने तत्काल ही ओरछा रियासत के तत्कालीन दीवान नत्थे खां को सौंप दिए थे। यह पत्र और कटार उनके परिजनों द्वारा बाद में तात्या टोपे संग्राहल में रखवाएं गए थे।
Published on:
14 Aug 2021 10:59 am
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