
history of orchha
ओरछा/टीकमगढ़. आपके घर में नव निर्माण हो या नव चेतना आए, तो उसका नामकरण किसी संत पुरुष से कराएं। साधु और संत जो नाम बोलेंगे, वह नाम नहीं, बल्कि मंत्र होगा। जब गुरु या साधु के पास जाएं तो सब उस पर छोड़ दें। उसमें विचार न करें। या तो सब गुरु पर छोड़ दो, या फिर गुरु को छोड़ दो। यह बात मोरारी बापू ने श्रीसद्गुरु जन्म शताब्दी महोत्सव में चल रही श्रीरामकथा के सातवें दिन कहीं।
मलूकपीठाधीश्वर देवाचार्य राजेन्द्रदास जी महाराज के सानिध्य में ओरछा में चल रही मोरारी बापू की रामकथा के सातवें दिन शुक्रवार को बापू ने ओरछा के नामकरण की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि एक प्राचीन कथा के अनुसार यहां पर महाराज रूद्रप्रताप का शासन था। एक दिन वे आखेट करते हुए यहां पर आए। प्यास लगने पर वेत्रवंती (बेतवा) नदी के पास पहुंचे। प्यास बुझाकर राजा, यहां पर निवास करने वाले महर्षि तुंग के पास आए। तुंग ऋषि ने राजा से कहा कि सावन तृतीया को यहां पर मेला लगता है। उस मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के साथ कुछ लोग लूटपाट करते हैं। उनकी रक्षा को वह कुछ करें।
संत की आज्ञा पर राजा ने यहां पर नगर का निर्माण कराया। इसके नामकरण के लिए वह तुंग ऋषि के पास पहुंचे तो ऋषि भी आनंदित होकर राजा के पास तेज कदमों से आए। इससे पैर में ठोकर लगने से उनके मुंह से ओछा-ओछा-ओछा निकला और राजा ने ऋषि के मुख से निकले इस शब्द पर यहां का नाम ओछा रख दिया। कालांतर में यह परिमार्जित होकर ओरछा हुआ और अब यहां सद्गुरु कृपा से इसका नाम और अच्छा हो गया है। उन्होंने कहा कि ओछा सत्य है, ओरछा प्रेम है और और अच्छा करुणा है।
नामकरण का विशेष महत्व है
बापू ने नामकरण का महत्व बताते हुए कहा कि इस संस्कार का विशेष महत्व है। मैं तो मानता हूं कि जब बच्चा 4-5 साल का हो जाए तो, उससे पूछा जाए कि बेटा तेरा क्या नाम रखना है। बापू ने विनोद करते हुए कहा कि मेरे पास भी कई लोग बच्चे का नाम रखवाने आते हैं। पहले तो मैं पूछ लेता हूं कि आप लोगों ने कुछ सोचा हो तो बताएं। लेकिन लोग कहते नहीं, बापू आप ही रखें। मैं कहता हूं कि आदर्श रखूं। तो एक-दूसरे का मुंह देखते हैं और कहते है कि बापू आनंद कैसा रहेगा। मैं कहता हूं बहुत अच्छा। अरे भाई या तो गुरु पर सब छोड़ दो, या फिर गुरु को छोड़ दो।
सब में सम रहो
बापू ने कहा कि मानस हमें हर परिस्थिति में सम रहना सिखाती है। जैसे दिन के प्रकाश को हम सहर्ष स्वीकार करते हैं, लेकिन रात के अंधकार को भी हम मानते हैं। फिर हम जय-पराजय, निंदा-स्तुति, मान-अपमान, दुख-सुख को क्या कबूल नहीं करते। हमें सत्संग और मानस यही सिखाते हैं।
प्रभु हमें स्वीकार अवश्य करेगा
बापू ने कहा कि हम सब ईश्वर की संतान हैं। वह हमें स्वीकार अवश्य करेगा। जैसे जब बछड़े का जन्म होता है, तो वह गर्भ की गंदगी से सना होता है। लेकिन जैसे ही वह मां के शरणागत होता है, मां उसे दुलाकर साफ कर देती है। ऐसे ही भगवान भी हमें स्वीकार करता है। जरूरत है सद्गुरु और परमात्मा की शरणागति लेने की है। उन्होंने युवाओं से कहा निराश मत हो। आज देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है। लेकिन हमारे मनीषी सदियों से कथा के माध्यम से यह अभियान चला रहे है।
व्यसन से दूर रहो
बापू ने युवाओं को व्यसन से दूर रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यदि एकदम से नही छोड़ सकते हो, तो कम करो। रामराजा के सामने शपथ लो और वेत्रवंती गंगा में यह व्यसन विसर्जित कर दो। उन्होंने कहा कि शराब वास्तविकता है, लेकिन इससे होने वाली कैंसर जैसी बीमारियां संभावना। ऐसी संभावनाओं से दूर रहो। बापू ने कहा कि वह मत खाएं, जिसका ठाकुर जी को प्रसाद न लगाया जा सके। आधा पेट खाना खाएं, पौन पेट पानी पीयें और पौन पेट कथा-भजन करें। भजन से मुक्ति मिलेगी। भजन की डकार है मोक्ष।
जमकर नाचे श्रोता
शुक्रवार को कथा में नजारा अलग ही था। कथा के आखिरी समय में बापू द्वारा गए भजनों पर श्रोताओं ने जमकर नृत्य किया। आलम यह था कि कुछ श्रोता और संत तो मंच पर ही पहुंच गए और व्यासपीठ के चारों ओर नृत्य करते दिखाई दिए। इसके पूर्व राजेन्द्रदास जी महाराज ने सद्गुरु गणेशदास जी भक्तमाली का पद दासनहित सबही कुछ कीन्हों, गाकर सुनाया।
Published on:
30 Dec 2017 07:30 am
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