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यमुना पर मुरारी बापू का दर्द कहा,यमुना नदी में नहीं यमुना जल

राम राजा वास्तिवक है, राम राज्य संभावना है। हर पत्थर वास्तिवक है, लेकिन उससे मूर्ति बनना संभावना है। बुद्ध पुरूष कहते है हर पत्थर में मूर्ति है।

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ओरछा/टीकमगढ़. राम राजा वास्तिवक हैं, राम राज्य संभावना है। हर पत्थर वास्तिवक है, लेकिन उससे मूर्ति बनना संभावना है। बुद्ध पुरष कहते हैं हर पत्थर में मूर्ति है। बस उसमें बेकार पत्थर निकालकर उसे तराशने की आवश्यकता है। ऐसे ही हर मनुष्य के जीवन में अनंत संभावना है आवश्यकता है तो सद्गुरु की। यदि जीवन में सद्गुरु मिल जाए तो हम जैसे पत्थर भी मूर्ति बना जाए। यह बात ओरछा में रामकथा के छठे दिन मोरारी बापू ने कही।

श्रीसद्गुरु जन्मशताब्दी महोत्सव के छठे दिन मोरारी बापू ने सद्गुरु की महिमा को निरूपित करते हुए कहा कि जिस प्रकार से हर पत्थर में मूर्ति बनने की संभावना है, हर वृक्ष की लकड़ी से मूर्ति बनने की संभावना है, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति में अनंत संभावनाएं हैं। अब उसे कौशिक, विश्वामित्र जैसे सद्गुरु मिल जाएं, तो उसकी संभावनाओं को प्रकट कर दे। बापू ने कहा कि जीवन में सद्गुरु का होना बहुत जरूरी है।

मानस ने राम रूपी गाय दी है
बापू ने कहा कि दृष्टि बदलने से एक को फायदा होता है, लेकिन सृष्टि बदलने से पूरे विश्व को फायदा होता है। राम ने सृष्टि बदली है। राम राजा वास्तिवक है, लेकिन संभावनाएं बहुत दे गए हैं। बस हम कर पाए। ज्ञान, भक्ति और कर्म यह मार्ग है। संभावना है परमात्मा रूपी मंजिल। इसमें मत उलझो कि मार्ग कौन सा है। लक्ष्य देखो। मानस ने हमें राम रूपी गाय दी है। दूध और उससे घी की अनंत संभावनाएं हैं।

राम राजा निरूपमेय हैं
कथा में बापू ने श्रीराम राजा के महात्म्य को बताते हुए कहा कि कोई कवि भी श्रीराम को उपमा नहीं दे सका है। तुलसी ने ही उन्हें धरम धुरीन, भानूकुल भानू की उपमा दी है। बापू ने कहा कि मेरे राघव को कल्पतरू नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह लकड़ी हैं, सुमेरू भी नहीं क्योंकि वह जड़ हैं, चिंतामणी कहो तो वह पत्थर हैं, सूर्य कहो तो उसमें तीव्रता है, प्रचण्ड है। राम को कोई संज्ञा नहीं दी जा सकती। राम तो निरूपमेय हैं। उसे कैसे तौलें।

राजा को विश्वासपात्र होना चाहिए
बापू ने राजा के गुण बताते हुए कहा कि राजा को विश्वासपात्र होना चाहिए। प्रजा को उस पर धर्म, काम और अर्थ के क्षेत्र में विश्वास होना चाहिए। राजा धर्म परायण हो। कामी न हो। राजस्व का भली प्रकार सदुपयोग करें। महाभारत में तो राजा के लिबास के विषय में भी बताया गया है। राजा को दण्ड देने का अधिकार है। दण्ड की मात्रा भी राजा को तय करनी आनी चाहिए। समर्थ को दण्ड और असमर्थ को माफी देना चाहिए। राम ने समर्थ बाली का वध किया। उन्होंने वर्तमान के जनप्रतिनिधियों के लिए कहा कि राजा को वही बोलना चाहिए, जो पूरा कर सकें।

यमुना की पीड़ा झलकी
कथा के बीच में कृष्ण का जिक्र करते हुए बापू ने कहा कि अगले वर्ष दीपावली के बाद वृंदावन में कथा होगी। वृंदावन की याद आते ही उन्हें यमुना जी की याद आई और उनकी पीड़ा स्पष्ट दिखाई दी। उन्होंने कहा कि आज यमुना में यमुना जल नहीं है। यमुना कर्म की नदी है। कर्म के बिना एक पल नहीं रहा जा सकता। इसके लिए साधु-संत भी बहुत प्रयास कर रहे हैं, लेकिन आखिर जिम्मेदार इतना बिलंब क्यों कर रहे हैं।


बताई रामनाम की महिमा: बापू ने कथा में रामनाम की महिमा बताई। उन्होंने कहा कि लोग तुसली से पूछते है कि आप इतना रामनाम का सुमिरन करते है, मानस लिख दी। इससे क्या मिलता है। उन्होंने कहा कि राम तो बीज मंत्र है। उन्होंने खुद के परिपेक्ष में कहा कि जब तीन बार मेट्रिक पास आदमी आज व्यासपीठ पर बैठकर गा रहा है, तो इससे अधिक राम नाम की महिमा क्या हो सकती है। उन्होंने युवाओं से कहा कि निराश मत हो। जीवन में हरि को पाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।
शिव-पार्वती विवाह के साथ हुआ रामजन्म: इसके बाद बापू ने शिव-विवाह और राम जन्म की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि सती, पार्वती के रूप में हिमालय राज के यहां जन्म लेती है। पार्वती के जन्म के बाद नारद जी उन्हें योग्य वर के लिए शिव की तपस्या करने को कहते है और इसके बाद शिव-पार्वती का विवाह होता है। बापू ने शिव की भूत-प्रेतों की बारात का भी विनोदपूर्ण वर्णन किया। बापू ने कहा कि श्रद्धा और विश्वास के विवाह के बाद ही राम का जन्म होता है। इसके बाद उन्होंने महाराज दशरथ के द्वारा पुत्रेष्ठी यज्ञ एवं यज्ञ से प्रकट खीर के प्रसाद के सेवन के बाद राम जन्म की कथा सुनाई। कथा में श्रद्धालुओं ने जमकर रामजन्म का उल्लास मनाया।
बेटी बचाओं का दिया संदेश: कथा में बापू ने पार्वती जी के जन्म की कथा के साथ ही बेटी बचाओं का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि बेटी के जन्म के पर बेटे से अधिक खुशी मनाओं। बापू ने कहा कि बेटी श्रद्धा है। बेटी भगवत की 7 विभूतियां लेकर पैदा होती है।
सुनाई शायरी: उन्होंने वृंदावन में कही अपनी पहले की कथा को याद करते हुए कहा कि आज भी उन्हें वृंदावन की बहुत याद आती है।- इस पर बापू ने शायरी पड़ी- ये सच है कि तूने मुझे चाहा ही बहुत है।
लेकिन मेरी आंखों को रूलाया भी बहुत है।
बापू ने यह भी पढ़ा- आंधिया गम की चलेगी तो संवर जाऊंगा
मै तेरी जुल्फ नही हूं, जो बिखर जाऊंगा।
वा खुदा अब तो मेरे दिल में कोई तमन्ना भी नही
फिर भी क्या बात है दिल कहीं लगता नही।
सिर्फ चेहरे की उदासी देखकर निकल आए आंसू
दिल का आलम तो तूने अभी देखा ही नही।
करके दया, दयाल ने पर्दा हटा दिया, इस देवता ने आज मेरे दिल को चुरा लिया।
कुंवरगनेशी की भक्ति वंदनीय है: गुरूवार को कथा में पधारे वृंदावनधाम के रमणरेती के संत दत्तशरणानंद जी महाराज ने ओरछा की रानी कुंवरगनेश की भक्ति को वंदनीय बताया। उन्होंने कहा कि रानी की क्या भक्ति रही होगी। गुरू के चरणों में क्या महान हृदय रहा होगा। भगवान के चरणों में क्या बात्सल्य रहा हो, कि भगवान स्वयं ओरछा आए। राजा-रानी ने यहां भगवान को राजा बना दिया और स्वयं सेवक बन गए। उन्होंने कहा कि रामराजा से ऐसी कामना है कि हमारे अंदर के काम, क्रोध, लोभ का दमन करें।