
Kailash Bihari, the author of the Bundeli dictionary, is no more
टीकमगढ़. बुंदेली शब्दकोश के रचियता, साहित्यकार एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कैलाश बिहारी द्विवेदी का शुक्रवार की तड़के निधन हो गया। वह 90 वर्ष के थे। उकने निधन की सूचना मिलते ही तमाम जनप्रतिनिधि, साहित्यकार एवं प्रशासनिक अधिकारी उनके निवास पर पहुंचे। दोपहर 2 बजे स्थानीय मुक्तिधाम पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।
देश की स्वतंत्रता के लिए साधना करने के बाद बुंदेली भाषा को सम्मान दिलाने के लिए पूरे जीवन काम करने एवं इनके शब्दों को संजोकर इसका शब्दकोश बनाने वाले जिले के जाने-माने साहित्यकार कैलाश बिहारी द्विवेदी का निधन हो गया। वृद्धावस्था के चलते वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। सुबह 4 बजे उनके निधन के बाद जैसे ही लोगों को सूचना मिली पुरानी नजाई स्थित उनके आवास पर लोगों का पहुंचना शुरू हो गया। वहीं उनके निधन की सूचना पर प्रशासन और पुलिस के अधिकारी भी पहुंचे और उनके अंतिम संस्कार को लेकर तैयार की गई। वहीं दोपहर 2 बजे निवास से उनकी अंतिम यात्रा निकाली गई। स्थानीय मुक्तिधाम पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके निधन पर जिले के तमाम साहित्यकारों, जनप्रतिनिधियों ने शोक संवेदना व्यक्त की है। वहीं जिले के जानेमाने व्यंगकार रामस्वरूप दीक्षित ने बुंदेली साहित्य के लिए इसे एक अपूर्णीय छति बताया है। उनके निधन पर तमाम सोशल मीडिया पर भी पूरे दिन शोक संवेदनाओं के मैसेज चलते रहे।
चला गया धीमी आवाज में जोर से बोलने वाला आदमी: रामस्वरूप दीक्षित
स्वतंत्रता सेनानी , भाषा वैज्ञानिक और बुंदेली भाषा के वैज्ञानिक अध्येता डॉ कैलाश बिहारी द्विवेदी का जाना लेखकीय स्वाभिमान के कंगूरे का ढह जाना है। हिंदी में स्वाभिमानी और निडर लेखकों की परंपरा की वे संभवत: अंतिम कड़ी थे। उनकी आजीविका साधारण शिक्षक की थी , पर व्यक्तित्व इतना असाधारण था कि कोई उनके सामने बोलने की जहमत नहीं उठाता था। उनका एक अलग ही रौब और रुतबा था। ऐसी धाक थी कि जहां भी जाते थे , लोग उठकर खड़े हो जाते थे।साहित्यिक हलकों में तो उनका ऐसा खौफ तारी था कि लोग उनके सामने गलत स्थापनाएं करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। वे अकेले लेखक थे जिनका साहित्य के अलावा समाज और राजनीति में बेहद सम्मान था। बुंदेली शब्दकोश के रूप में उनका अवदान अविस्मरणीय है। बुंदेली का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन कर उसे एक समृद्ध भाषा का दर्जा दिलाने में उनकी अहम भूमिका रही।उनके इस काम को राष्ट्रीय स्तर पर रेखांकित किया गया और पुरस्कृत भी। उनका आर्थिक पक्ष ज्यादा मजबूत नहीं रहा , लेकिन उससे उनके व्यक्तित्व की चमक पर कोई असर कभी दिखाई नहीं दिया। समझौतों और सुविधाओं के गठजोड़ को मात देते हुए एक निष्कलंक और तेजस्वी जीवन जीने वाले द्विवेदी जी बाल वृद्ध सभी के द्वारा दद्दा के नाम से संबोधित किए जाते थे। उनकी बेधक दृष्टि अच्छों अच्छों को नजरें झुकाने पर मजबूर कर देती थी। उनसे आंख मिलाकर बात करने का साहस मैंने किसी में नहीं देखा। बहुत धीमी आवाज में बोलने वाले इस शख्स की आवाज बहुत दूर और देर तक सुनी जाती थी। सामाजिक और असामाजिक सभी तरह के तत्व उनका बराबर सम्मान करते थे। उनके जैसा सर्वस्वीकार व्यक्ति दुर्लभ है। वे अलग ही धातु से निर्मित थे। वह धातु अब उनके पार्थिव शरीर के साथ आज विलुप्त हुई। वे न रहने के बाद भी बने रहेंगे अपनी ठोस रचनात्मक उपलब्धियों के बूते। वे उन लोगों में से थे जो जाने के बाद भी नहीं जाते।
Published on:
19 Nov 2022 08:50 pm
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