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कभी स्पेन जाता था बुंदेलखंड का पत्थर

पायरोफ्लाईट डायस्पॉर पत्थर की एशिया की सबसे बेहतर खदान बंद है

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Pyrofeite Diaspora Stone Asia Tikamgarh foreign

Pyrofeite Diaspora Stone Asia Tikamgarh foreign

टीकमगढ़.ऐतिहासिक इमारतों और राजशाही परंपराओं के लिए पहचाने जाने वाले बुन्देलखण्ड के पत्थरों को भी विदेशी धरती पर पसंद किया जाता रहा है। लगातार दोहन और सरकार की खनिज नीति के चलते आज आलम यह है कि देश और विदेश में भारतीय संस्कृति की पहचान बन चुके पायरोफ्लाईट डायस्पॉर पत्थर की एशिया की सबसे बेहतर खदान बंद है। जिले के कारी में स्थित खदान सरकार की गलत नीतियों का शिकार हुई है। खनिज संरक्षण अधिनियम के निर्देशों को धता बताते हुए आज भी बेशकीमती पत्थर खराब होने की कगार पर है, लेकिन जिले से लेकर प्रदेश में बैठे आला अधिकारियों को मामले की सुध नहीं है।


बुन्देलखण्ड में पाई जाती रही है कायांतरित चट्टानें: यह कोई दस बीस या तीस वर्ष की नहीं बल्कि वर्षों पुरानी बात है। बुन्देलखण्ड में कायांतरित चट्टानें पाई जाती हैं। यह वर्षों पुरानी हैं।

बुन्देलखण्ड में पायरो फ्लाइट डॉयस्पॉर, बेराईट, एस्बेस्टस, लेडका सल्फाइड गेलेना, आयरनोर एवं टिम्बरलाइट चट्टानें बहुतायत मात्रा में पाई जाती हैं। स्थानीय लोगों के लिहाज से यह पत्थर कीमती रहे हों या नहीं परंतु विदेश में इन पत्थरों की खूब मांग रही और विदेशों में इन पत्थरों ने अपनी पहचान कायम कर ली।


सीमित क्षेत्रों में मिलता है पायरोफ्लाईट डायस्पॉर:

जिला मुख्यालय की समीपस्थ नगर पंचायत कारी में स्थित है एशिया की नम्बर 1 पायरोफ्लाईट डायस्पॉर की खदान। कभी यहां का पत्थर विदेशों में जमकर बिका और नक्काशी के बाद इसकी मांग लगातार बढ़ती गई।

वैसे देखा जाए तो पायरोफ्लाईट डायस्पॉर केवल टीकमगढ़, छतरपुर, झांसी, महोबा और ललितपुर में ही पाया जाता था। यह सभी खदानें स्टेट माइनिंग कॉर्पोरेशन के अधीन हैं। इसमें नेचुरल एल्यूमीनियम सिलिकेट पाया जाता है। जिसके चलते यह पैंट, साबुन, सिरेमिक में फिलर मटेरियल के रूप में उपयोग होता है।


स्पेन में है इसके दीवाने: भारतीय खान ब्यूरो के आरक्यूपी पुष्पेन्द्र सिंह चौहान ने बताया कि पूर्व में चीन की जिजियान और खुजियान प्रांत में स्थित खदानों में पायरोफ्लाईट डायस्पॉर पत्थर बड़ी मात्रा में पाया जाता था और इसकी सप्लाई स्पेन में थी।

जहां इसका अच्छा खासा बाजार था परंतु प्रदूषण की भेंट चढ़ी इन खदानों का उत्पादन खत्म हुआ तो चीनी व्यापारियों ने भारत की ओर रूख किया और टीकमगढ़ स्थित कारी की खदान का पत्थर स्पेन जाने लगा।

राजशाही दौर में बनाए जाते थे बर्तन: इस पत्थर का महत्व इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजशाही दौर में इस पत्थर का उपयोग राजा महाराजाओं के बर्तन बनाने के लिए किया जाता था।

पत्थर को परिष्कृत कर उस पर की गई नक्काशी इन बर्तनों को बेशकीमती बना देती थी। राजशाही दौर का यह महत्व आधुनिक काल में भी दिखा और नक्काशी एवं परंपरा के शौकीनों के लिए यह आकर्षण का केन्द्र बन गया।


गलत नीतियों ने बर्बाद किया कारोबार: विदेश तक डिमांड रखने वाले पायरोफ्लाईट डायस्पॉर सहित अन्य खनिज उत्पादों के लिए शासन आज तक कोई खास नीति नहीं बना सका है। जिसके चलते इनकी खदानें बर्बाद हो गई हैं।

31 मेजर मिनिरल को माइनर मिनिरल में डालने के साथ ही पायरोफ्लाईट डायस्पॉर को भी माइनर मिनिरल बना दिया गया। माइनर मिनिरल के लिए सरकार के पास कोई स्पष्ट नीति नहीं और न ही रायल्टी आदि वसूलने के कोई स्पष्ट नियम हैं।

जिससे यह खदानें अब अच्छे कारोबार देने के बाद भी अच्छे समय की बाट जोह रही हैं। खनिज संरक्षण अधिनियम 1988 के तहत खनिजों को नष्ट या खराब नहीं किया जा सकता है परंतु इसके बाद भी कारी खदान में बेशकीमती पत्थर पड़ा है।

जो बारिश एवं मौसम की मार से खराब हो सकता है। बीते तीन वर्षों से बंद पड़ी यह खदान अब अच्छे दिनों को इंतजार कर रही है।