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टीकमगढ़. बुंदेखलण्ड की धरती अध्यात्म और भाव से समृद्ध है। भगवान राम सोने की लंका में नही रुके, अपनी पवित्र जन्म भूमि श्रीअवध धाम को छोड़ यदि इसे सूखी भूमि और जंगली क्षेत्र में आए तो केवल महारानी कुंवरगणेश की सच्ची श्रद्धा और भाव के कारण आए। यह बात मूलकपीठाधीश्वर देवाचार्य राजेन्द्रदास महाराज ने रामायण और श्रीराम महायज्ञ के शुभारंभ अवसर पर व्यास पीठ से कहीं।
शुक्रवार को स्थानीय झिरकी बगिया मंदिर प्रांगण में जहां श्रीराम महायज्ञ का शुभारंभ किया गया, वहीं पास ही गंजीखाना ग्राउण्ड पर श्रीवाल्मीकि रामायण कथा का शुभारंभ हुआ। वृंदावधाम के मलूकपीठाधीश्वर देवाचार्य राजेन्द्रदास महाराज ने कथा का प्रारंभ करते हुए कहा कि यहां के लोगों के पास भले ही धन की कमी हो, सुविधा न हो, लेकिन भाव बहुत है। और भगवान भाव के भूखे है। ओरछा की महारानी कुंवरगणेश के इन्हीं भाव के कारण 16 31 में भगवान अयोध्या छोड़कर ओरछा चले आए थे। यहां पर महाराज मधुकरशाह का भी भाव देखने को मिलता है। कि उन्होंने खुद को सेवक मानकर सारा राज्य भगवान श्रीरामराजा को अर्पित कर दिया और उन्हें राजा बना दिया। यही भाव की समृद्धि है।
सत्ता स्वयं राम के वरण को लालायित रहती है: राजेन्द्रदास महाराज ने कहा कि भगवान श्रीराम जैसे शासक सत्ता, पद, प्रतिष्ठा की कामना नही करते। बल्कि सत्ता स्वयं ऐसे शासकों की कामना करती है। यह देश की बिडम्बना है कि स्वतंत्रा के बाद से राम राज्य की स्थापना के लिए प्रयास नही हुआ। अरे यहां राम जी ही तम्बू में बैठे है, तो रामराज्य कहां से आएगा। उन्होंने कहा कि रामराज्य में केवल मानव जाति ही नही बल्कि जीव, जंतु तक की चिंता की जाती है। उन्होंने गोवध पर चिंता करते हुए कहा कि जब तक देश की धरती पर गोमाता की रक्त की बूंद गिरती रहेगी, देश में रामराज्य की कल्पना नही की जा सकती है।उन्होंने कहा कि जिस दिन हमारे देश के जनप्रतिनिधि इस भाव से काम करने लगेंगे, देश घाटे से उबर जाएगा।
इसके पूर्व कथा के मुख्य यज्ञमान विधायक राकेश गिरि अपनी पत्नी लक्ष्मी गिरि के साथ रामायण लेकर कथा स्थल पहुंचे। यहां पर मलूकपीठाधीश्वर ने रामायण का पूजन कर उसे व्यासपीठ पर रखा। वहीं कार्यक्रम में पधारे वृंदावनधाम के वहारघाट के महंत रामप्रवेशदास महाराज, धीर समीर आश्रम के महंत मदनमोहनदास महाराज, धजरई त्रिदेव मंदिर के महंत सीतारामदास महाराज सहित अन्य संतों ने दीप प्रज्जवलन कर कथा को विधिविधान से प्रारंभ कराया। वहीं झिरकी बगिया मंदिर प्रांगण में बनारस, वृंदावन एवं अयोध्या से पधारे यज्ञाचार्यों ने श्रीराम महायज्ञ प्रारंभ कराकर अग्रि प्रवेश, पीठ पूजन कराया। रात को रासलीला में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच कर धर्मलाभ ले रहे है।
वाल्मीकि रामायण वेद का सार
राजेन्द्रदास महाराज ने वाल्मीकि रामायण का महात्व बताते हुए कि यह वेद का सार है। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि जी को आदिकवि कहा जाता है। उन्होंने कहा कि कवि वह नही होता, जिसे केवल तुकबंदी आती हो। कवि वह है, जिसे हर तत्व का ज्ञान हो। उन्होंने कहा कि जब प्रकृति का निर्माण हुआ तो सबसे पहले ब्रह्मा जी को ही ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होंने वेदों की रचना की। वाल्मीकि जी ब्रम्हा जी के ही अवतार थे। उनकी रामायण वेदों का ही सार है। उन्होंने वेद माता गायत्री का गायत्री मंत्र और वाल्मीकि रामायण भी समानता है। गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं और वाल्मीकि रामायण में 24 हजार शब्द। गायत्री मंत्र का अर्थ ही श्रीराम है। उन्होंने कहा कि यदि आपको सरस्वती जी की प्राप्ति करनी है तो नित्य प्रति श्रद्धाभाव से वाल्मीकि रामायण का परायण करें।
विकास का मंत्र बताया
उन्होंने कहा कि यदि हम किसी काम को यह विचार कर करें कि यह श्रीराम का कार्य है तो उसमें असफलता और घाटा कभी नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यह देश की बिडम्बना है कि चाहे देश की सरकार हो, प्रदेश की सरकार हो, या कंपनियां हो, सब घाटे में चल रही है। क्यों कि उन्हें घाट में ही फायदा है। उन्होंने कहा कि सब कर्ज लेकर मजे कर रहे है। यदि स्वतंत्रता के 72 वर्षों के सभी घोटाले निकाले जाए तो यह 72 हजार से अधिक होंगे। उन्होंने कहा कि जब तक देश में रामराज्य स्थापित नहीं होगा, यह घाटे का क्रम नही रूकेगा। जब भगवान वनवास से वापस लौटे तो भरत जी ने उन्हें सारा राजपात सौंप दिया। उस समय भरत जी ने कहा था कि भगवान आप जो राजकोष छोड़ गए थे, वह 10 गुना अधिक हो गया है। यह इसलिए हुआ था कि भरत जी इसी भाव से काम कर रहे थे कि यह सब भगवान राम का है।
Published on:
01 Jun 2019 10:03 am
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