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श्रीभागवत महोत्सव के आयोजन में पहुंचे श्रृद्धालु

राजेंद्र पार्क मानस मंच पर कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा का सुनने के लिए शहर और ग्रामीण क्षेत्र के सैकड़ो श्रृद्धालू शामिल हो रहे है।

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The story of abandoning Lokeshasan in the story of the fourth day

टीकमगढ़.राजेंद्र पार्क मानस मंच पर कथा का आयोजन किया जा रहा है। कथा का सुनने के लिए शहर और ग्रामीण क्षेत्र के सैकड़ो श्रृद्धालू शामिल हो रहे है। रविवार को कथा में संत दीदी मां मंदाकिनी किंकर ने श्रीराम अमृत कथा में कहा कि मनुष्य के जीवन में लोकेष्णा का त्याग अति महत्वपूर्ण है। लोकेष्णा की अति जहां जागृत होती है। वहां त्रिशंकु पैदा होते है। त्रिशंकु वह राजा थे जो मानव देह में स्वर्ग पहुंचना चाहते थे। गुरू वशिष्ठ ने जब मृत्युलोक में ऐसा करने से अपने आपको पृथक किया। तब त्रिशंकु ने महर्षि विश्वामित्र का सहारा लिया और फिर स्वर्ग के लिए रास्ता बना तो जरूर लेकिन देवताओं के अनुनय पर विश्वामित्र ने दूसरा स्वर्ग नहीं बनाया और त्रिशंकु अधर में यानि न पृथ्वी पर और न स्वर्ग में बल्कि आकाश में अटक गए। आज मनुष्य को भी अपने जीवन में ऐसी कल्पना नहीं करना चाहिए जो सृष्टि से विपरीत हो। संत दीदी मां मंदाकिनी किंकर ने आज श्रीराम अमृत कथा के चौथे दिन प्रसंग सुनाया।
स्थानीय मानस मंच राजेन्द्र पार्क में श्रीभागवत धर्म महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन के दौरान संत दीदी मां मंदाकिनी किंकर ने श्रीराम अमृत कथा में रविवार को मैनाक पर्वत पर वृहद व्याख्या की। कल के इसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए दीदी मां ने कहा कि हनुमानजी सीता रूपी शांति की खोज में जब लंका की ओर प्रस्थान कर रहे थे। तब उनका समुद्री मार्ग में तीन शक्ति रूपी नारियों से अलग-अलग रूप में सामना हुआ और हनुमानजी महाराज का व्यवहार भी तीनों जगह अलग-अलग रहा। प्रथम सुरसा नाम की सर्पो की मां से सामना हुआ तो सुरसा ने कहा कि मैं बहुत दिनों से भूखी हूं। आज मुझे आहार मिलेगा। तब हनुमानजी ने कहा कि प्रथम मुझे अपने लक्ष्य की प्राप्ति एवं स्वामी के काम को पूरा करना है। इसके बाद मैं स्वयं ही तुम्हारी भूख बुझाने के लिए उपस्थित हो जाउंगा। इस पर सुरसा ने क्रोधित होकर बड़ा रूप धारण किया। तब हनुमानजी ने उससे दुगुना रूप धारण कर लिया किन्तु जब सुरसा ने सौयोजन का मुख बना लिया तब हनुमानजी ने अति सूक्ष्म रूप धारण किया। दीदी मां ने इस सूक्ष्म रूप की व्याख्या करते हुए बताया कि हनुमानजी चाहते तो दो सौयोजन का रूप धारण कर सकते थे। लेकिन वह अपने लक्ष्य की पूर्ति में सफल न हो पाते।

आज भी संदेश देती कर्मनासा नदी
मनुष्य जीवन में लोकेष्णा के त्याग को अति महत्वपूर्ण बताते हुए महाराजा त्रिशंकु की कथा का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि महाराज त्रिशंकु गुरू वशिष्ठ के शिष्य थे। जिनमें सशरीर स्वर्ग जाने की अतिलोकेष्णा जागृत हुई। महाराज वशिष्ठ ने लोकेष्णा त्याग एवं प्राकृतिक विधि विपरीत कार्य न करने से मना किया तब महाराज त्रिशंकु विश्वामित्र के पास गए और महर्षि विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर लोकेष्णा के कारण ही सदेह स्वर्ग भेज दिया। लेकिन देवताओं ने महाराजा त्रिशंकु को स्वर्ग से नीचे लटका दिया। जो आज भी आकाश में त्रिशंकु के नाम से जाने जाते है। उनके मुंह से उलटा लटके होने के कारण जो लार बही, वही लार कर्मनासा नदी के रूप में उत्तरप्रदेश और बिहार के मध्य में बह रही है। जहां एक ओर मां यमुना और गंगा नदी की एक बूंद शरीर पर गिरने पर सभी पापों का क्षय हो जाता है, वहीं कर्मनासा नदी की एक बंूद भी शरीर पर गिरने से पुण्यों का नाश हो जाता है।