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मासी नदी तट पर समेलिया गांव में भरा मेला, 100 से अधिक गांवों से पहुंचे श्रद्धालु

कठमाणा के निकटवर्ती ग्राम समेलिया गांव में मासी नदी के तट पर करीब 500 साल पुराने द्वारिकाधीश मंदिर में वार्षिक फूलडोल मेले की शुरुआत हुई।  

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मासी नदी तट पर समेलिया गांव में भरा मेला, 100 से अधिक गांवों से पहुंचे श्रद्धालु

मासी नदी तट पर समेलिया गांव में भरा मेला, 100 से अधिक गांवों से पहुंचे श्रद्धालु

कठमाणा के निकटवर्ती ग्राम समेलिया गांव में मासी नदी के तट पर करीब 500 साल पुराने द्वारिकाधीश मंदिर में वार्षिक फूलडोल मेले की शुरुआत हुई। मेला पूरी तरह से परवान पर रहा। मेले में समेलिया के अलावा टोंक, जयपुर, दूदू, सवाईमाधोपुर जिले सहित आसपास दूरदराज के करीब 100 से अधिक गांवों के के लोग हिस्सा लेने पहुंचे।

यह मेला लोगों के लिए वर्ष भर की आय का जरिया तथा अध्यात्मिक संस्कृति के ताने-बाने को बुनने का केंद्र है। पंडित मनोजकुमार शर्मा ने बताया कि धुलंडी के पर्व पर गुजरात राज्य स्थित ङ्क्षहदू तीर्थस्थल भेंट द्वारका में भगवान द्वारकाधीश के पट दर्शन के लिए बंद रहते हैं। लेकिन धुलंडी पर्व पर समेलिया के द्वारकाधीश मंदिर पर वार्षिक फूलडोल मेला लगता है।

इस अवसर पर दिन भर मंदिर के पट खुले रहते हैं। मान्यता के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी से 7 दिनों के लिए भगवान द्वारिकाधीश द्वारिका धाम से समेलिया धाम पर आकर विराजते है तथा भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

जो लाभ भेंट द्वारका में दर्शन करने से मिलता है, वहीं लाभ समेलिया में भगवान द्वारकाधीश के होली पर्व पर आयोजित होने वाले वार्षिक मेले में दर्शन करने से मिलता है। इसी आध्यात्मिक परंपरा को लेकर यह मेला करीब 500 सालों से अधिक समय से आयोजित हो रहा है।

मेले की पहचान चितौडगढ़ किले के विजयस्तम्भ आकृति की महलमालिया मिठाई है, जिसका भगवान द्वारकाधीश को भोग लगता हैं। यह मिठाई शक्कर के घोल को एक सांचे में भरकर बनाई जाती है। इसी मिठाई का भोग लगता है।

1527 में हुआ था मंदिर का निर्माण

इस मंदिर का निर्माण करीब 500 साल पहले यहां के राजा अजितङ्क्षसह सोलंकी ने करवाया था। यह मंदिर राजस्थान के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। मंदिर का निर्माण 1527 ईस्वी की कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन गौड़ ब्राह्मणों की मदद से किया गया था। मंदिर का निर्माण रथ के आकार में हो रखा है। साथ ही मंदिर के शिखरों में सभी धर्मों के शिखर बने हुए है। भगवान रणछोड़ को लोग ऋणमुक्ति के पूजते है। यहां होली पर्व की बजाए रंग पंचमी को धुलंडी खेली जाती है।

मेले में झूला-चकरी, व कई दुकानें सजी

मेले में नदी किनारे से लेकर स्कूल चौराहे तक घरेलू सामान, मिठाइयों, प्रसाद, साज श्रृंगार, कुटीर उत्पादों, मनिहारी, रोजमर्रा जरूरत के सामानों के एक किलोमीटर दूरी तक सडक़ के दोनों ओर बाजार सजे रहे।