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कांटा जाल तकनीकी से फंसेंगी छोटी-बड़ी मछलियां, एक माह से बनास नदी में अपनाई जा रही है तकनीक

बनास नदी सहित जलाशयों में मछली पकडऩा टेडी खीर साबित हो रही थी। जो अब नई तकनीक से आसान नजर आने लगी है। यह पिछले एक माह से बनास नदी में अपनाई जा रही है। जो अन्य तकनीक से अधिक फायदेमंद साबित हो रही है।  

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कांटा जाल तकनीकी से फंसेंगी छोटी-बड़ी मछलियां, एक माह से बनास नदी में अपनाई जा रही है तकनीक

कांटा जाल तकनीकी से फंसेंगी छोटी-बड़ी मछलियां, एक माह से बनास नदी में अपनाई जा रही है तकनीक

बनास नदी सहित जलाशयों में मछली पकडऩा टेडी खीर साबित हो रही थी। जो अब नई तकनीक से आसान नजर आने लगी है। अब नदी नालों के साथ ही जलाशयों में अब मछलियों का संवेदक के कार्मिकों से बचकर निकलना मुश्किल है। इस तकनीक को कांटा जाल के नाम से जानते हैं। जो पिछले एक माह से बनास नदी में अपनाई जा रही है। जो अन्य तकनीक से अधिक फायदेमंद साबित हो रही है।


नदी के पानी में अधिक फायदा
नदी में लम्बे पाट व जलभराव क्षेत्र अधिक दूरी तक फैला होने से मछली पकडऩा टेड़ी खीर साबित होती थी। क्यों कि नदी में अन्य तकनीक से मछली पकडऩे में शिकार शुरू होते ही मछलियों डरकर इधर-उधर भागने लगती है। जिससे संवेदक की जाल में कम मात्रा में मछलियां फंसती है। जिसके कारण कई मर्तबा संवेदक का टेंडर समय पूरा हो जाता है ओर संवेदक को नुक़सान उठाना पड़ता है। ऐसे में उक्त तकनीक के तहत मछली पकडऩे से अधिक मात्रा में मछलियां जाल में फंस जाती है।

पन्द्रह दिन का लगता समय

कांटा जाल तकनिक से नदी में एक एरिया में मछली पकडऩे के लिए पहले एरिया निश्चित किया जाता है। वहां चारों तरफ जाल लगाकर लकडिय़ों के सहारे बांध दिया जाता है। उसके बाद धीरे-धीरे बांधी गई जाल का एरिया कम किया जाता है। एरिया के अंदर की मछली पानी में भी रहती वो भागने में कामयाब नही हो सकती है।

करीब एक एरिया में मछली पकडऩे में एक पखवाड़े का समय लग जाता है। मगर एरिया की जाल की सम्पूर्ण मछली जाल में फंस जाती है। जिससे मछली संवेदक को घाटा होने से बच जाता है। उस क्षेत्र की सम्पूर्ण बडी मछलियां निकाल ली जाती है। छोटी मछलियां जाल के छेद से बाहर निकल जाती है।