
15 मंदिरों से जुड़ा हैं पीपलू का इतिहास, कभी टूकड़ा (टोंक) पीपलू पगरने का रहा हैं हिस्सा
पीपलू (रा.क.)। पीपलू का इतिहास 15 मंदिरों से जुडा है। जिनमें से कई तो खण्डहर हो गए, लेकिन सातवीं सदीं में निर्मित श्री चारभुजाजी के मंदिर की बेजोड़ कारीगरी व पत्थरों पर उत्कीर्ण उत्कृष्ट शिल्प ने पीपलू कस्बे को अलग से पहचान दी है। वहीं टोंक के इतिहास के मुताबिक कभी जिला मुख्यालय टोंक भी पीपलू परगने का हिस्सा रहा था।
टोंक के प्रसिद्ध साहित्यकार लेखक हनुमान प्रसाद सिंहल की पुस्तक टोंक का इतिहास, टोंक वार्षिकी के मुताबिक भारत के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौळान के समय में यह टूकड़ा (टोंक) पीपलू परगने के अंतर्गत आता था। जिसको पृथ्वीराज चौहान ने अपने यशस्वी सेनापति चामुंडा राय को जागीर में दे दिया था।
टोंक जिला मुख्यालय से बीस किलोमीटर दूरी पर उत्तर दिशा की ओर पीपलू कस्बा बसा हुआ है। जिसकी बसावट का इतिहास काफी प्राचीन एवं ऐतिहासिक है। कहा जाता है कि पीपलू के बसने से पूर्व यहां घणा जंगल विद्यमान होने सहित जंगली हिंसक जानवर बहुतायात में थे। उस समय सिर्फ तालाब किनारे भगवान देवनारायण का स्थान था।
पत्थरों की कारीगरी करती है आकर्षित
बीसवीं सदी में निर्मित मंदिरों में दिगम्बर जैन मंदिर, धोबीयान, कीर व चंदेल खटीकान समाज के शिव मंदिर है। श्री चारभुजाजी के मंदिर में विराजमान श्रीजी के मुख्यद्वार के दाईं और लगे शिलालेख के अनुसार इस मंदिर के 6 97 ईस्वी में निर्मित होने की पुष्टि होती है। शिलालेख अस्पष्ट है लेकिन पढऩे पर थोडा ही स्पष्ट होता है।
इस पर मंदिर निर्माता पिताशाह महाजन बीजाबरगी इनकी धर्म पत्नी नाथी बांई व उनके पुत्र गोपाल का नाम अंकित है। पुरा वैभव गाथा से ओत्-प्रोत् इस धरोहर के संरक्षण के लिए पुरातत्व विभाग ने कभी सुध-बुध नहीं ली।
जबकि इसके निर्माण में कहीं भी चुने सीमेन्ट का उपयोग नहीं हुआ, बल्कि बींसवी सदीं के मंदिर निर्माणों में चुने सीमेन्ट, मार्बल कोटा स्टोन के पत्थरो का उपयोग हो रहा है। इससे पहले उत्कृष्ट शिल्प से उत्कीर्ण पत्थरों के उपयोग से मंदिरों के निर्माण हाते थे। इन्हीं में एक श्रीचारभुजाजी का मंदिर है, जिसकी बेजोड़ पत्थरों की कारीगरी कला बरबस राह चलते को आकर्षित करती है।
औरंगजेब ने किया था हमला
कहा जाता है कि पन्द्रहवीं सदीं में मुगल हुकूमत के शासक औरंगजेब ने मूर्ति पूजा का विरोध करते हुए हिन्दू मंदिरों व मूर्तियों को नष्ट करने के चलाए अभियान दौराने यहां के श्रीचारभुजाजी मंदिर पर भी सैनिकों के सहित हमला किया था। जिसका उदाहरण मंदिर के शिखरबंधों के पत्थरो पर उत्कीर्ण मूर्तियों की खण्डित अवस्था देखे जाने से स्पष्ट होता है। मुगल शासक के हमले की सूचना पर मंदिर सेवक मारे भय के श्री चारभुजाजी की मूर्ति को छिपाकर टोंक स्थित श्री चतुर्भुज तालाब स्थित अहिल्या बाई की छत्री समीप के धोबी घाट के नीचे खड्ड़ा खोद छिपा आए।
जिसका पता कपड़े धोने आए धोबी तथा अहिल्या बाई नामक भक्त को स्नान करने के समय पानी में विष्णु स्वरूप श्री हरि के हुए दर्शन की चमत्कारिक घटना से जैसे ही लगा, तो इनके कहने पर टोंक के पंच पटेलों ने धोबी घाट समीप पहुंच कर खुदाई करवाई, तो चतुर्भुजरूप धारी प्रतिमा पत्थर के नीचे ढकी हुई मिली।
जैसे प्रतिमा दिखी तो लोगों में अपार हर्ष आनन्द हुआ और मारे प्रसन्नता के जयकारे लगाए। तो आस पास के हजारों लोग प्रतिमा देखने उमड़े। इसके बाद गाजे-बाजे से प्रतिमा को तालाब की पाल पर नया मंदिर बनाकर स्थापित किया जो आज भी चतुर्भुज महाराज के नाम से विख्यात है। इधर आक्रमणकारियों के चले जाने के बाद पीपलू मंदिर सेवक प्रतिमा को लेने टोंक स्थित तालाब पंहुचे लेकिन मूर्ति प्रतिष्ठापित हो जाने से उन्हें निराश लोटना पड़ा।
तब पिताशाह वंशजों ने हुबहू श्रीचारभुजानाथ की प्रतिमा लाकर पुर्नस्थापित कराई। मंदिर में सेवा पूजा कार्य के लिए पाराशर जाति के ब्राह्मण पुष्कर से लाए गए। मंदिर व्यवस्था संचालन के लिए मंदिर निर्माता ने 36 5 बीघा कृषि भूमि मंदिर के अधीनस्थ रखी। इस भूमि की आय से आज भी सेवको के परिवारों का जीवन-यापन हो रहा है। मंदिर के चारों तरफ हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाएं व उत्कृष्ट कलाकृतियां उत्कीर्ण हैं।
वहीं बारहदरी पर भव्य मण्डप बना हुआ है तथा एक सौ आठ सीढ़ीयां हैं। इनमें से करीबन एक सौ तीन सीढ़ीयां मिट्टी में दब चुकी बताई। मंदिर का निर्माण इस प्रकार किया गया हैं कि सूर्योदय की प्रथम किरण श्रीजी के विग्रह पर प्रतिबिम्बित होती है तथा कस्बे की प्राचीनता की पुष्टि उबड़-खाबड़ बस्तियों एवं खुदाई के दौरान पकी-पकाई ईंटे, चुल्हे, भाण्डे आदि मिलने से होती है।
यह मंदिर साम्प्रदायिक सद्भाव का जीता-जागता उदाहरण है जिसके सामने जैन मंदिर तथा समीप ही पीर बाबा का स्थान है। यह कस्बा करीबन 1300-1400 वर्ष पुराना है। बेजोड़ शिल्पकला, चमत्कारों के कारण श्री चारभुजाजी का मंदिर वर्तमान में जन-जन की आस्था का केन्द्र बना हैं। जहां रोजाना होने वाले संकीर्तन, आरती के कार्यक्रमों में काफी संख्या में श्रद्धालु मय परिवारों के दर्शन व मन्नत करने उमड़ते है।
Published on:
14 Oct 2020 07:07 pm
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