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राजस्थान की अनोखी होली यहां रंग-गुलाल नहीं पत्थरों से खेली जाती थी होली, सिर फूटना होता था शुभ

पिछले पांच दशक में होली का महत्व तो कम नहीं हुआ, लेकिन होली मनाने केे परम्परागत तरीकों में बदलाव जरूर आया है।  

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धूलण्डी

टोंक टोडारायसिंह में धूलण्डी पर रगों से सरोबर युवक-फाइल फोटो

अवधेश पारीक
टोडारायसिंह. होली का नाम जुबां पर आते ही आंखों के आगे रंगों से सराबोर ऐसे दृश्य तैरने लगते है, जिनमें खुशी उमंग एवं अल्हड़ता का मिश्रण होता है। वही हुड़दंग व लोगो की हंसी ठिठोली के बीच मजाक का पात्र बनने वाली मीठी कसक भी शामिल होती है। पिछले पांच दशक में होली का महत्व तो कम नहीं हुआ, लेकिन होली मनाने केे परम्परागत तरीकों में बदलाव जरूर आया है। इससे होली का मूल स्वरूप भी प्रभावित हुआ है।

टोडारायसिंह कस्बे में होली के अवसर पर खेला जाने वाला भाटा-राड़ (पत्थरों की लड़ाई) का खेल भी प्रेम व सद्भावना का प्रतीक था। जिसमें सिर फूटने को शुभ माना जाता था चंग की थाप पर, गीत व साखियों के बीच खेले जाने वाला होली का पर्व टोडारायसिंह में भाटा-राड़ के लिए प्रसिद्ध रहा है। इसे दूर-दूर के लोग देखने आते थे बुजर्ग बताते है कि कस्बे में परम्परानुसार प्रत्येक होली के तीसरे दिन भूड़ा पोल से ईलाह जी (बादशाह) की सवारी लाई जाती थी तथा चतरी पोल (महल रास्ते का दरवाजा) से शनेती (शवयात्रा) की सवारी निकाली जाती थी दोनों सवारियां माणक चौक के समीप आमने-सामने खड़ी रहती थी

दोनों ओर की सवारियों में शामिल लोग चंग की थाप पर साखियों की प्रस्तुति करते हुए संघर्ष का आह्वान करते थे। साखियों की हार होते ही पत्थरों की बौछार शुरुहो जाती थी। भाटा-राड़ में सिर फूटने को शुभ माना जाता था ऐसी मान्यता थी कि सभी बिमारियों व क्लेश दूर हो गए है। पत्थरों की लड़ाई के इस खेल में मनमुटाव व रंजीश का लेस मात्र भी नही था

धार्मिक सौहार्द का प्रतीक इस खेल में वैष्णव, जैन, मुसलमान, हिंदू व अन्य सभी जाति समाज के लोग हिस्सा लेते थे लेकिन पिछले तीन दशक पूर्व इस लड़ाई (भाटा-राड़) की प्रथा रोक लगा दी है। केवल सवारियां निकाल कर गुलाल लगाई जाती है। सायंकाल आमसागर, भूतेश्वर, बुद्धसागर, लाडपुरा व अन्य प्राकृतिक व पिकनिक स्थलों पर पहुंच कर गोठों का आयोजन किया जाता है। होली के पर्व पर आज भी बुजुर्गो व युवाओं द्वारा भाटा-राड़ याद किया जाता है।

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