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रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से आयरन की मात्रा घटने से जमीन हो रही रोगी, मिट्टी परीक्षण में हुआ चौकाने वाला खुलासा

अधिक उत्पादन के फेर में किसान आंखें मूंद रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं।

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 मिट्टी की जांच

टोंक के कृषि विभाग स्थित प्रयोगशाला में मिट्टी की जांच करते प्रभारी।

टोंक. जिले की भूमि में साल दर साल आयरन की मात्रा घट रही है। कृषि विभाग की ओर से तैयार किए गए साढ़े तीन लाख मृदा स्वास्थ्य कार्ड(सॉयल हैल्थ कार्ड) को लेकर की गई मिट्टी की जांच में इसका खुलासा हुआ है। इसका कारण रासायनिक उर्वरकों की अधिकता है। ऐसे में वो दिन दूर नहीं, जब इसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ेगा।

अधिक उत्पादन के फेर में किसान आंखें मूंद रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं। यही कारण है कि खाद्यान्न में इनकी कमी से मानव शरीर में भी इनकी कमी होती जा रही है। विभाग की ओर से अब तक जिले के 3 लाख60 हजार 594 मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाए गए है।

मिट्टी की जांच, पौषक तत्वों की कमी, अधिकता, कौनसी फसल के लिए मिट्टी उपयुक्त है, तथा इसमें कितने किलो उर्वरक की आवश्यकता है। यह सब बताने के लिए कार्ड बनाए गए है।

रासायनिक उर्वरकों की खपत बढ़ी
विभागीय अधिकारियों का मानना है पिछले कुछ वर्षों से किसान अधिक उत्पादन के फेर में रासायनिक खाद का अंधाधुंध प्रयोग में लगे हंै। इससे फसलों के उत्पादन में तो वृद्धि हुई है। इसके विपरीत भूमि की उर्वरा शक्ति क्षीण होती जा रही है।

मिट्टी की जांच सामने आया है कि डीएपी, यूरिया उर्वरकों के उपयोग से भूमि में पौषक तत्वों में कमी आई है। इसमें सर्वाधिक कमी ३३ फीसदी जिंक व आयरन में आई है। ऐसे में भूमि का जैविक परिर्वतन किया जाना जरूरी है। इससे चिंतित कृषि महकमे ने भूमि को जैविक में बदलने की मुहिम छेड़ दी है। इसके तहत जिले में बनाए २५ कलस्टर भी बनाए गए हैं।


स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव
भूमि के जहरीली होने से मानव जीवन भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यही कारण है कि बच्चों, पुरुषों व महिलाओं में आयरन व जिंक की कमी होने लगी है। वजह साफ है कि ये तत्व हमें खाद्यान्न से ही मिलते हैं। नतीजन मिट्टी में इनकी कमी होने से शरीर में भी इनकी कमी सामने आ रही है।


मिट्टी की जांच में आयरन व जिंक की कमी होती जा रही है। किसान नाईट्रोजन, फॉस्फोरस तो दे रहे हैं, लेकिन पोषक तत्वों का ध्यान नहीं रख रहे। इसके लिए जैविक खाद भी दिया जाना चाहिए। इससे किसानों को अधिक भाव मिलने के साथ जिंस की गुणवत्ता व उत्पादन भी बढ़ेगा।
रामगोपाल कड़वा, मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला प्रभारी टोंक।