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रीता रह गया जौधपुरिया का मासी बांध, 29 गांवों की 6985 हैक्टेयर कृषि भूमि पर सिंचाई का संकट

रीता रह गया जौधपुरिया का मासी बांध, 29 गांवों की 6985 हैक्टेयर कृषि भूमि पर सिंचाई का संकट  

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रीता रह गया जौधपुरिया का मासी बांध, 29 गांवों की 6985 हैक्टेयर कृषि भूमि पर सिंचाई का संकट

रीता रह गया जौधपुरिया का मासी बांध, 29 गांवों की 6985 हैक्टेयर कृषि भूमि पर सिंचाई का संकट

वनस्थली. जौधपुरिया में तीन नदियों माशी, बांडी, खारीखाशी, के संगम पर बने माशी बांध में मानसून कमजोर रहने के कारण नाममात्र का पानी बचा है। बांध में डेढ़ स्टोरेज 300 एमसीएफटी से भी नीचे लगभग 250 एमसीएफटी पानी बचा है। 29 गांवों की 6985 हैक्टेयर भूमि की लाइफ लाइन माशी बांध की लाइफ लाइन डेढ़ स्टोरेज से भी नीचे चली गई है।


क्षेत्र के 29 गांवों की 6985 हैक्टेयर भूमि की समृद्धि, खुशहाली, हरियाली, के प्रतीक माशी बांध में अक्टूबर के अंत तक भी पानी की आवक नहीं होने से किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरे दिखाई दे रही है। जहां वर्ष 2019 में 2011 के करीब 8 साल बाद माशी बांध के कैचमेंट एरिया में अच्छी बारिश होने से 20 अगस्त 2019 को ही 10 फीट भराव क्षमता को छूने के बाद चादर चली थी, लेकिन इस बार अभी तक डेढ़ स्टोरेज भी कवर नहीं हो पाया हैं।

सिंचाई विभाग के जेईएन मुकेश गुर्जर ने बताया कि मासी बांध में लगभग 250 से 300 एमसी एफटी बारिश दर्ज की गई है। वहीं वहीं गत वर्ष कुल 829 एमएम बारिश दर्ज की गई थी, जबकि सामान्य बारिश 600 मिमी होती है। इस बार के मानसून में बांध में पानी की आवक न के बराबर हुई हैं। और जो भी पानी है वह फिलहाल डेढ़ स्टोरेज में गत वर्ष का पानी बचा हैं।

जेईएन गुर्जर ने बताया कि बांध की भराव क्षमता हमेशा अगस्त के आखिरी में या सितम्बर के पहले सप्ताह तक की बारिश में पुरी हो जाती थी, लेकिन अब उम्मीद न के बराबर है। क्षेत्र के लोगों की लाइफलाइन माशी बांध में 2011 में फुल भरने के बाद 2019 में फुल भराव क्षमता 10 फीट पहुंचने के बाद सितंबर के तीसरे सप्ताह मे चादर चली थी।


71 किमी लम्बी है नहरों
क्षेत्र में स्थित मासी बांध से एक बड़ी व 9 छोटी नहरों से सिंचाई होती है, जिनमेंं बड़ी कैनाल 42.18 किमी लम्बी, व 9 छोटी नहरें 29 किमी लम्बी है, जिससे 6985 हैक्टेयर भूमि की फसलों को जीवनदान मिलता है, लेकिन इस बार बांध में पानी की आवक नही होने से नहरे भी सुखी पड़ी है। इस बांध के भरने से 29 गांवों के करीब 31 हजार से अधिक लोगों को फायदा मिलता हैं।