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Rain In Rajasthan: मकर संक्रांति की दोपहर टोंक जिले के आवां कस्बे में गोपाल चौक पर हजारों लोगों की नजरें एक ही सवाल पर टिकी थीं—इस साल बारिश कैसी होगी? जवाब तलाशा जा रहा था एक ऐसी परंपरा से, जो पीढ़ियों से किसानों की उम्मीदों और आशंकाओं से जुड़ी रही है। मौका था पारंपरिक दड़ा महोत्सव का।
दोपहर करीब 12 बजकर 15 मिनट पर 70 किलो वजनी दड़े की विधिवत पूजा की गई। इसके बाद दड़े को गढ़ के चौक में रखा गया और फिर शुरू हुआ जोर-आजमाइश का अनोखा खेल। आवां सहित बारहपुरों से आए हजारों खिलाड़ी और ग्रामीण करीब दो घंटे तक दड़े को निर्धारित दिशा में पहुंचाने की कोशिश करते रहे। धक्का-मुक्की, पसीना और उत्साह—हर चेहरे पर साल के भविष्य को जानने की बेचैनी साफ दिखी।
इस परंपरा को लेकर मान्यता है कि यदि दड़ा दूनी गोल पोस्ट की ओर जाता है तो इसे सुकाल यानी अच्छी बारिश का संकेत माना जाता है, जबकि अखनिया की दिशा में जाने पर अकाल की आशंका जताई जाती है। इस बार कड़ी मशक्कत के बावजूद दड़ा किसी भी दिशा में नहीं गया और अंत में गढ़ की ओर चला गया।
दड़े के बेनतीजा रहने से किसानों में हल्की निराशा जरूर दिखी, लेकिन राहत भी साफ झलकी। किसानों का कहना है कि दड़ा न सुकाल गया, न अकाल की ओर—जिसका अर्थ है कि आने वाला साल सामान्य रहेगा। न तो अत्यधिक बारिश की उम्मीद है और न ही सूखे का डर।
कार्यक्रम के दौरान सरपंच दिव्यांश एम. भारद्वाज ने भी इस परंपरा का संदेश स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि दड़ा दूनी दरवाजे की ओर नहीं गया, इसका मतलब अकाल नहीं है। यह संकेत देता है कि वर्ष संतुलित रहेगा और किसानों को मेहनत व धैर्य के साथ आगे बढ़ना होगा।
दड़ा महोत्सव सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि किसानों की भावनाओं, विश्वास और मौसम से जुड़ी आशाओं का प्रतीक है। इस बार दड़े ने कोई बड़ा फैसला नहीं सुनाया, लेकिन इतना जरूर कहा कि आने वाला साल न उम्मीदों से भरा होगा, न डर से—बल्कि संतुलन के साथ बीतेगा।
Updated on:
15 Jan 2026 12:13 pm
Published on:
15 Jan 2026 12:13 pm
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