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video: नेट पर दिख रहा टोंक की सुनहरी कोठी नाम, ढूंढऩे में हो रहे परेशान

नजरबाग स्थित विश्व विख्यात सुनहरी कोठी को देखने के लिए तो देश के विभिन्न प्रदेशों से लोग आ रहे हैं, लेकिन उन्हें सुनहरी कोठी तक पहुंचने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल नेट पर टोंक के नाम से सर्च करने पर सुनहरी कोठी दिखाई देती है।

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टोंक. नजरबाग स्थित विश्व विख्यात सुनहरी कोठी को देखने के लिए तो देश के विभिन्न प्रदेशों से लोग आ रहे हैं, लेकिन उन्हें सुनहरी कोठी तक पहुंचने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल नेट पर टोंक के नाम से सर्च करने पर सुनहरी कोठी दिखाई देती है। ऐसे में लोग उसे देखने के लिए आ तो रहे हैं, लेकिन शहर के समीप हाइवे पर आने के बाद उन्हें कोठी तक पहुंचने में पूछताछ का सहारा लेना पड़ रहा है।

शहर में एक भी स्थान पर सुनहरी कोठी को लेकर कोई बोर्ड नहीं लगा है। वहीं सुनहरी कोठी कहां यह भी शहर में किसी स्थान पर अंकित नहीं है। जब कोठी के सामने व्यक्ति पहुंचता है तो उसे वहां लगे पुरातत्व विभाग के बोर्ड को देखकर अंदाजा लगाना पड़ता है। यह बोर्ड नहीं हो तो यह कोई सामान्य ही नजर आए।


हाइवे पर लगे बोर्ड :

प्रशासन को चाहिए कि शहर की ऐतिहासिक व पर्यटन स्थलों का उल्लेख बोर्ड के माध्यम से शहर में प्रवेश करने वाले हाइवे तथा मुख्य मार्गों पर किया जाए। छावनी बायपास पर गेट तो लगा है, लेकिन वह शहर की जानकारी कम विज्ञापन का काम अधिक कर रहा है। शहर से गुजर रहे हाइवे पर बोर्ड पर राजनेताओं ने अपने पोस्टर चिपका दिए हैं। इससे गेट लगाने का उद्देश्य नजर नहीं आ रहा है। जबकि प्रशासन को चाहिए कि वह सुनहरी कोठी समेत अन्य पर्यटन स्थलों को नेट के माध्यम से प्रचारित करे। साथ ही हाइवे पर इनका उल्लेख करे। तब जाकर यहां प्रदेश व देश के पर्यटक आएंगे।

यह है सुनहरी कोठी की खास बात, रजिस्टर में लिखते हैं नाम

सुनहरी कोठी में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का नाम, मोबाइल नम्बर व शहर का नाम लिखा जाता है। सुबह से शाम तक इसे खोला जाता है। औसत 15 आ रहे हैं सुनहरी कोठी एक दशक पहले जिर्णशीर्ण होने पर बंद कर दी गई थी। फिर पुरातत्व विभाग को डेढ़ करोड़ रुपए का बजट दिया गया था। इस राशि से विभाग की ओर से कोठी की चारदीवार को ऊंचाकर कर गार्डन बनाया गया है। वहीं गार्डन में फुलवारी व पानी के फंव्वारे बनवाए गए हैं।

कम ही संख्या में आ रह हैं पर्यटक: जिले में यूं तो पयर्टन की असीम सम्भावनाएं हैं, लेकिन फिलहाल यहां पयर्टकों की संख्या काफी कम है। यहां नियुक्त कर्मचारी के मुताबिक हर महीने महज 15 से 20 लोग ही आ रहे हैं। इनमें दिल्ली, हरियाणा समेत राजस्थान के विभिन्न जिलों के लोग शामिल है।