
टोंक के उपखण्ड अधिकारी डॉ. सूरजसिंह नेगी
टोंक.
प्रशासनिक काम में बेहतरी के साथ लोगों के लिए प्रेरणादायक बनना किसी के लिए बहुत मुश्किल होता है, लेकिन जिले में ऐसे व्यक्तित्व की कमी नहीं है। हम बात कर रहे हैं टोंक के उपखण्ड अधिकारी डॉ. सूरजसिंह नेगी की। उनके कार्यालय में आना वाला कोई फरियादी मायूस नहीं लौटता। वहीं वे कार्यालय समय के बाद ऐसा कार्य कर रहे हैं, जो लोगों के लिए प्रेरणा बन रही है।
तहजीब व शब्दों पर पकड़ रखने वाले शहर के लोगों का रुझान कुछ सालों से साहित्य में कम होने लगा था। इसमें अच्छी पकड़ रखने वाले डॉ. नेगी ने टोंक में ऐसे लोगों को जोडऩा शुरू किया और कई किताबें लिखी। उनसे प्रेरणा लेकर शहर में एक बार फिर साहित्य का दौर चल पड़ा है। शहर के कई लेखकों ने फिर से कलम सम्भाल ली है।
यहां से हुई शुरुआत
उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा में12 दिसम्बर 1967 को जन्मे डॉ. सूरजसिंह पुत्र इन्द्रसिंह नेगी ने प्रत्येक कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए एम. कॉम व एम. फिल राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से किया। इसी विश्वविद्यालय ने उन्हें वर्ष 1994 में ‘क्रटिकल एप्पेरिसल ऑफ इण्डस्ट्रीज डवलपमेंट ऑफ राजस्थान’ विषय पर पीएचडी से नवाजा। साहित्य में उनकी रूचि विद्यालय शिक्षा के दौरान से थी।
नेगी की पुस्तक ‘पापा फिर कब आओगे’ (कहानी संग्रह), ‘रिश्तों की आंच’ (उपन्यास हिन्दी व उर्दू), वसीयत (उपन्यास) प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा सामाजिक व आर्थिक दशा पर दो दर्जन से अधिक लेख, राजस्थान व भारतीय अर्थ व्यवस्था से सम्बन्धित तीन दर्जन से अधिक आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।
उनकी रचनाएं ‘मास्टरजी’, ‘नीलकुमारी’, ‘सरदार भगतसिंह’, ‘चन्द्रशेखर आजाद’, ‘मद्यपान’, ‘परिवार नियोजन’, ‘दुर्योधन की प्रतिज्ञा’, ‘डायरी के पन्ने’, ‘कुछ बिखरी कहानियां’, ‘सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक व राजस्व’ विषयों पर विचार बिंदु अब प्रकाशित होंगे। उन्होंने वर्ष १९९१ से १९९७ तक आकाशवाणी जयपुर में कहानियों व वार्ताओं का प्रसारण किया है। अभी राजस्व सम्बन्धित विषयों पर प्रसारण में हिस्सा ले रहे हैं।
कई मिल चुके पुरस्कार
डॉ. सूरजसिंह नेगी को कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। साहित्य के लिए उन्हें ‘फाकिर ऐजाजी’ अवार्ड वर्ष 2016, ‘डॉ. दुर्गालाल सोमानी’ 2016, ‘मनु स्मृति’ 2016, राजकीय कार्य के लिए वर्ष 2005 में उपखण्ड स्तरीय, वर्ष 2003 व 2015 में श्रेष्ठ कार्य सम्पादन करने पर जिला स्तर पर सम्मान मिल चुका है।
सामाजिक सरोकार में भी नहीं है पीछे
निर्धनों की सहायता के लिए उन्होंने वर्ष 2015 में टोंक सहायता केन्द्र का गठन किया। इसमें 1500 लोगों को कम्बल,800 को ऊनी जर्सियां तथा 40 हजार को कपड़े वितरित किए गए।
साहित्य व सेवा को ही बना लिया जीवन
स्कूल हो गई चमन
शैक्षणिक व्यवस्था गड़बड़ाने से विद्यार्थियों तथा अभिभावकों का बमोर के स्कूल से मोह भंग हो गया था। इसके बाद डॉ. नेगी ने वर्ष 2016 में इस राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय बमोर को गोद लिया। इसमें विभिन्न नवाचार कराए गए। आज ये विद्यालय जिले में आकर्षण का केन्द्र बन चुका है। इसी बदौलत प्रधानाचार्य को गत 26 जनवरी को राज्य स्तर पर सम्मानित किया गया। अजीम प्रेमजी फाउण्डेशन व जनसरोकार मंच के साथ मिलकर कहानी, कविता, पत्र लेखन व चित्रकला प्रतियोगिताएं भी डॉ. नेगी ने कराई।
Published on:
23 Aug 2017 08:53 am
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