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दस घंटे का सफर तय कर पिछोला में समाई देवास की जलराशि

आकोदड़ा और अलसीगढ़ बांधों में 55-60 एमसीएमफटी पानी है, जो पिछोला और फतहसागर को भरेगा। दोनों बांधों में कुछ पानी छोड़कर बाकी झीलों में लाया जाएगा। यहां झीलों को भरने में दो — तीन दिन लगेंगे।

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आकोदड़ा और अलसीगढ़ के गेट खोले, मादड़ी के आज खोलेंगे

उदयपुर. बढ़ती गर्मी और शहर में पेयजल की मांग को देखते हुए जल संसाधन विभाग की ओर से देवास प्रोजेक्ट के बांधों का पानी झीलों में लाने की प्रक्रिया शुक्रवार को शुरू की गई। पहले दिन आकोदड़ा और अलसीगढ़ के गेट खोले गए, वहीं मादड़ी बांध के गेट शनिवार को खोले जाएंगे। दोपहर 2 बजे आकोदड़ा से निकली जलराशि करीब दस घंटे का सफर तय कर रात 11 बजे पिछोला झील में समाई।जल संसाधन विभाग के अनुसार दोपहर 2 बजे आकोदड़ा बांध के गेट एक एक फीट खोले गए, जिसका पानी नान्देश्वर चेनल से गुजरा, इसके बाद दोपहर 3 बजे अलसीगढ़ के गेट खोले गए, जिसका पानी अमरजोक नदी से गुजरा। दोनों का पानी सीसारमा नदी से होते हुए रात 11 बजे पिछोला में पहुंचा। इस दौरान सीसारमा नदी का गेज 2.7 फीट रहा।

इतना पानी आएगा झील में

बताया गया कि आकोदड़ा और अलसीगढ़ बांधों में 55-60 एमसीएमफटी पानी है, जो पिछोला और फतहसागर को भरेगा। दोनों बांधों में कुछ पानी छोड़कर बाकी झीलों में लाया जाएगा। यहां झीलों को भरने में दो — तीन दिन लगेंगे। इसी बीच शनिवार को मादड़ी बांध के गेट खोलेंगे।

पिछोला के पेटे में जलीय घास के ढेर, नहीं हटाए तो परेशानी

झील के पेटे में पड़ी जलीय खरपतवार चिंता का कारण बन गई है। समय रहते इसे नहीं हटाया गया तो ये पानी में समाहित होकर प्रदूषण और दुर्गंध का कारण बन सकती है। बांधों से पानी छोड़े जाने के बाद यह पानी अब पिछोला झील में पहुंचने लगा है। दूसरी ओर नगर निगम की ओर से डिविडिंग मशीन से निकाली गई जलीय घास और खरपतवार को झील के पेटे में ही ढेर के रूप में छोड़ दिया गया है। वर्तमान में रिंग रोड और कुम्हारिया तालाब क्षेत्र में बड़ी मात्रा में खरपतवार के ढेर पड़े हुए हैं। जलस्तर बढ़ने के साथ ही ये ढेर पानी में समा जाएंगे, जिससे पानी में सड़ांध और प्रदूषण बढ़ने की आशंका है।

आठ माह से लगे हैं ढेर

झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेजशंकर पालीवाल के अनुसार कुम्हारिया तालाब क्षेत्र में जलीय खरपतवार के ढेर पिछले सात-आठ माह से पड़े हैं। पानी में मिलने के बाद ये सड़कर बैक्टीरिया उत्पन्न करते हैं, जिससे जल गुणवत्ता प्रभावित होती है और दुर्गंध फैलती है। साथ ही यह गाद के रूप में जमा होकर झील की भराव क्षमता को भी कम करती है।

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