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बजट हो या स्टाफ, असमानता से बालवाटिकाओं में शिक्षा और देखभाल पर संकट

राजस्थान की बालवाटिकाओं में स्टाफ और बजट असमानता से व्यवस्था प्रभावित है। कहीं बच्चों पर कम शिक्षक हैं तो कहीं स्टाफ अधिशेष, जिससे शिक्षा और देखभाल दोनों संकट में हैं।

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मौजूदा व्यवस्था में न तो स्टाफ का सही वितरण है और न ही बजट का, इससे छोटे बच्चों की शिक्षा और देखभाल दोनों प्रभावित हो रही हैं।

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असमान बजट और स्टाफ संकट से बालवाटिकाओं की व्यवस्था चरमराई- ज्यादा बच्चों पर कम स्टाफ, कम बच्चों पर अधिशेष शिक्षक

उदयपुर. राजस्थान में महात्मा गांधी राजकीय विद्यालयों में संचालित बालवाटिकाओं की जमीनी हकीकत अब सवालों के घेरे में है। एक ओर कहीं 100 से अधिक बच्चों पर सीमित स्टाफ के भरोसे व्यवस्था चल रही है, तो दूसरी ओर कम नामांकन वाली बालवाटिकाओं में शिक्षक अधिशेष हैं। मौजूदा व्यवस्था में न तो स्टाफ का सही वितरण है और न ही बजट का, इससे छोटे बच्चों की शिक्षा और देखभाल दोनों प्रभावित हो रही हैं।

ऐसे है हालात, कहीं भीड़, कहीं कमरे खाली

राज्य में वर्तमान में 997 बालवाटिकाएं महात्मा गांधी विद्यालयों में और 400 पीएम श्री विद्यालयों में संचालित हैं।765 बालवाटिकाओं में नामांकन सिर्फ 15 से 45 के बीच है तो 500 में 45 से 60 तक है। 97 में 60 से 100 तक मात्र 35 बालवाटिकाएं ऐसी हैं, जहां 100 से अधिक बच्चे है।सबसे अधिक 139 बच्चों का नामांकन बालोतरा जिले के पुराना गांव एमजीजीएस में और उदयपुर के सुरफलाया में 115 बच्चों का नामांकन दर्ज है। इन आंकड़ों से साफ है कि कहीं संसाधन जरूरत से ज्यादा हैं तो कहीं बेहद कम है।

स्टाफ के असंतुलन से बिगड़ रही व्यवस्था

संघ के अनुसार कई पूर्व प्राथमिक शिक्षक (एनटीटी) नियुक्ति के समय से ही अधिशेष हैं और उन्हें कार्यालयों या कम नामांकन वाली बालवाटिकाओं में लगाया गया है। वहीं दूसरी ओर 75 से अधिक नामांकन वाली बालवाटिकाओं में अतिरिक्त शिक्षक, सहायक और सफाई कर्मियों की भारी कमी है, इससे बच्चों की देखरेख और पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

समान बजट पर उठे सवाल

बालवाटिकाओं को कम्युनिटी कनेक्ट प्रोग्राम, टीएलएम और क्लीनिक मद में 42 हजार का बजट दिया जाता है। चाहे वहां 15 बच्चे हों या 100। इस असंतुलन को लेकर राजस्थान पंचायती राज एवं माध्यमिक शिक्षक संघ ने प्रदेश अध्यक्ष शेर सिंह चौहान के नेतृत्व में शिक्षकों ने निदेशक सीताराम जाट को भी अवगत करवाया। संघ का कहना है कि यह व्यवस्था पूरी तरह अव्यावहारिक है और नामांकन के अनुसार बजट तय होना चाहिए। इसके अलावा कई बालवाटिकाओं में आज तक राउंड टेबल-चेयर और विभिन्न एक्टिविटी कॉर्नर की सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई है, इससे गतिविधि आधारित शिक्षण प्रभावित हो रहा है।

एजेंसी प्रथा पर भी उठे सवाल

बालवाटिकाओं में लगे सहायक और सफाई कर्मियों का भुगतान एजेंसियों के माध्यम से किया जा रहा है। संघ का आरोप है कि एजेंसियां विभिन्न कटौतियों के नाम पर कर्मचारियों का वेतन कम कर देती है, जिससे उन्हें न्यूनतम मानदेय भी नहीं मिल पाता। साथ ही इससे सरकार को भी आर्थिक नुकसान हो रहा है।

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इन समस्याओं को किया जाए समाधान

- अधिशेष एनटीटी शिक्षकों को अधिक नामांकन वाली बालवाटिकाओं में समायोजित किया जाए

- 75 से अधिक बच्चों वाली इकाइयों में अतिरिक्त स्टाफ और गार्ड की व्यवस्था

- बजट को नामांकन के अनुपात में तय किया जाए

- सभी बालवाटिकाओं में आवश्यक फर्नीचर व शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जाए

- एजेंसी प्रथा समाप्त कर एसएमसी/एसडीएमसी के माध्यम से भुगतान किया जाए