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स्थाई लोक अदालत का निर्णय: किडनी प्रत्यर्पण रोगी की रोकी राशि लौटाने के दिए आदेश

उदयपुर. मेडिक्लेम पॉलिसी होने के बावजूद बीमा कंपनी ने किडनी प्रत्यर्पण रोगी की बीमा राशि रोक दी।

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उदयपुर . मेडिक्लेम पॉलिसी होने के बावजूद बीमा कंपनी ने किडनी प्रत्यर्पण रोगी की बीमा राशि रोक दी। स्थाई लोक अदालत ने सुनवाई के बाद विपक्षी को आदेश दिया कि वह क्लेम के 1.52 लाख, केस दायर से 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज व मानसिक, शारीरिक क्षति व आवेदन खर्च के 10 हजार रुपए अलग से अदा करे।


जैन कॉलोनी सेक्टर-11 निवासी रुचि पत्नी संजय कोठारी ने फतहपुरा स्थित यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी, ई- मेडिटेक इंश्योरेंस जयपुर के शाखा प्रबंधक के खिलाफ पेश परिवाद में बताया कि वह अपने व परिवार के सदस्यों के लिए विपक्षी इंश्योरेंस कंपनी से काफी वर्षों से पॉलिसी ले रहा है। परिवादी के पति संजय कोठारी की दोनों किडनियां खराब होने पर डायलिसिस के लिए गीतांजलि चिकित्सालय में हाथ में एवी फिस्टूला बनाया।

मार्च, 2015 में वहां डायलिसिस भी करवाया। 17 अगस्त, 2015 को मेदांता हॉस्पिटल गुडग़ांव, हरियाणा में किडनी प्रत्यर्पण के लिए परीक्षण हुआ। 6 अक्टूबर 2015 को परिवादी के पति को भर्ती किया गया। ऑपरेशन कर 14 अक्टूबर को डिस्चार्ज किया। दोनों अस्पताल में 1.52 लाख का कुल खर्च हुआ। विपक्षी की पॉलिसी होने के बावजूद कोई राशि शेष नहीं होना बताकर क्लेम अस्वीकार कर दिया।

इसके अलावा प्री-हॉस्पिटलाइजेशन का प्रावधान नहीं रखने की सूचना उसे ई-मेल पर दी गई। परिवादी का कहना था कि क्लेम की राशि मुख्य पॉलिसी से अदा की जा सकती थी क्योंकि उस पॉलिसी में 3.79 लाख रुपए शेष था। स्थाई लोक अदालत के अध्यक्ष के.बी.कट्टा, सदस्य सुशील कोठारी व बृजेश सेठ ने सुनवाई के बाद माना कि विपक्षी कंपनी यह प्रमाणित करने में विफल रही कि किन आधारों पर एवं किस पॉलिसी से सम्पूर्ण भुगतान उसे हो चुका था, जिसके अधीन विपक्षी के क्लेम के विरुद्ध कोई राशि शेष देय योग्य होना नहीं पाई गई।


उदयपुर. बीमा अवधि में कार दुर्घटना होने पर खारिज क्लेम को स्थाई लोक अदालत ने दिलवाते हुए परिवादी को राहत पहुंचाई। जवाहर जैन स्कूल, सेक्टर-11 क्षेत्र निवासी कानू कोलान वी.रमेश पुत्र के.एम.केशवा ने दी ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड जरिये मंडलीय प्रबंधक देहलीगेट के विरुद्ध पेश परिवाद में बताया उसकी कार का विपक्षी कंपनी से एक वर्ष की अवधि का बीमा करवाया। बीमे के साथ विपक्षी ने अतिरिक्त प्रीमियम लेकर निल डेप्रिशिएशन पॉलिसी भी जारी की तथा आश्वासन दिया कि उक्त वाहन दुर्घटना में क्षतिग्रस्त होता है तो किसी भी प्रकार का डेप्रिशिएशन नहीं काटा जाएगा।

वाहन बीमित अवधि में 26 मार्च, 2014 को दुर्घटना में क्षतिग्रस्त हो गया। कंपनी को सूचना देने पर अधिकृत डीलर व सर्विस सेंटर के.एस.मोटर्स प्रा. लिमिटेड के यहां रिपेयरिंग के लिए रखा। फाइनल सर्वे के लिए विपक्षी ने भूपेन्द्र कालरा को सर्वेयर नियुक्त किया। प्रार्थी ने विपक्षी के निर्देशानुसार वाहन को रिपेयर करवाया। इसका कुल खर्च 70899 रुपए आया। कंपनी को देने पर उन्होंने महज उसके खाते में महज 21 हजार रुपए डाले। विभाग के चक्कर काटने पर उन्होंने न तो क्लेम का निस्तारण किया न ही कोई संतोषप्रद जवाब दिया।

स्थाई लोक अदालत के अध्यक्ष के.बी.कट्टा, सदस्य बृजेन्द्र सेठ व सुशील कोठारी ने विपक्षी बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह परिवादी को 41 हजार 281, परिवाद व्यय के 3 हजार सहित कुल 44281 रुपए दो माह में भुगतान करें।

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