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देवास तृतीय व चतुर्थ चरण: 2050 तक प्यास बुझाएगी देवास परियोजना, उदयपुर शहर के लिए पेयजल की दृष्टि से साबित होगी संजीवनी

उदयपुर . परियोजना के इन दो चरणों का प्रस्ताव सिंचाई विभाग ने जलदाय विभाग को मार्च में सौंपा गया।

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devas pariyojna, drinking water supply in udaipur

देवास तृतीय व चतुर्थ चरण: 2050 तक प्यास बुझाएगी देवास परियोजना, उदयपुर शहर के लिए पेयजल की दृष्टि से साबित होगी संजीवनी

उदयपुर . शहर को पर्याप्त पेयजल सुलभ करवाने के लिए कई परियोजनाएं बनी जिनसे पानी तो मिला, लेकिन भविष्य में बढऩे वाली मांग को देखते हुए अन्य परियोजनाओं पर भी काम करने की जरूरत महसूस की गई। ऐसे में देवास परियोजना के तृतीय और चतुर्थ चरण सामने आए। अगर इनको स्वीकृत मिल जाती है तो शहर को 2045 से 50 तक पानी पिलाने की व्यवस्था हो जाएगी, वहीं उदयपुर, चित्तौडगढ़़ एवं भीलवाड़ा के कई हिस्सों को पानी मुहैया करवाया जा सकेगा।


यह परियोजना उदयपुर शहर के लिए पेयजल की दृष्टि से संजीवनी का कार्य करेगी। परियोजना के इन दो चरणों का प्रस्ताव सिंचाई विभाग ने जलदाय विभाग को मार्च में सौंपा गया। अब इसकी प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति का इंतजार है। इस परियाजना के पूरा होने पर शहर को एक हजार एमसीएफटी अतिरिक्त पानी मिलना शुरू हो जाएगा। स्वीकृति मिलने के बाद इसे पूरा करने में करीब पांच वर्ष लगेंगे।

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बनेंगे दो और बांध

सिंचाई विभाग ने 696.37 करोड़ रुपए का प्रस्ताव बनाया है। इसमें देवास परियोजना तृतीय और चतुर्थ चरण में दो बांध बनाए जाएंगे। दोनों बांध को जोडऩे के लिए 4.5 किलोमीटर की टनल बनाई जाएगी। इसके बाद करीब 11 किलोमीटर की टनल बनाकर आकोदड़ा बांध से जोड़ा जाएगा। आकोदड़ा बांध से उदयपुर शहर तक करीब 11.05 किलोमीटर की टनल से पहले ही पानी पहुंच रहा है। ऐसे में देवास तृतीय एवं चतुर्थ का पानी करीब 27 किलोमीटर सफर कर उदयपुर पहुंचेगा।

देवास परियोजनाओं की स्थिति

दे वास परियोजना के दो चरण पूरे हो चुके हैं। इनमें से प्रथम से शहर को 125 एमसीएफटी पानी मिल रहा है। द्वितीय में आकोदड़ा डेम से 302 और मादड़ी डेम से 85.44 एमसीएफटी पानी मिल रहा है। तृतीय और चतुर्थ चरण के प्रस्ताव में करीब 1000 एमसीएफटी पानी मिलने का अनुमान लगाया गया है। शहर को तृतीय से 703 और चतुर्थ से 390 एमसीएफटी पानी मिलेगा।

देवास परियोजना के तृतीय और चतुर्थ चरण के प्रस्ताव हमने मार्च 2018 में पीएचईडी को भेज दिया था। वहां से प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति मिलने के बाद इस परियोजना को पूरा होने में करीब पांच वर्ष लगेंगे।

हेमंत पनडिय़ा, अधिशासी अभियंता, सिंचाई विभाग


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