
'हल्दीघाटी युद्ध ने संस्कृति रक्षा की दिशा दी, प्रताप ही जीते थे युद्ध में'
उदयपुर. हल्दीघाटी विजय युद्ध दिवस के उपलक्ष्य में दूसरे दिन प्रताप गौरव केंद्र 'राष्ट्रीय तीर्थ' में 'हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप ही विजय हुए' विषयक परिचर्चा हुई।
निदेशक अनुराग सक्सेना ने केंद्र में लगी वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की 57 फीट ऊंची प्रतिमा को नमन करते हुए बताया कि मेवाड़ के त्याग, इतिहास एवं बलिदान ने राष्ट्र के लिए प्रदर्शन किया। यह युद्ध अप्रतिम रहा। चाहे जितना भी भ्रम फैले, हम वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की विजय का गुणगान करते रहेंगे।
परिचर्चा में इतिहासविद् डॉ. देव कोठारी ने कहा कि जून, 1573 को अकबर ने गुजरात से लौटते समय आमेर के राजा मानसिंह को प्रताप से बातचीत करने भेजा। वार्ता में मानसिंह के असफल होने पर सितम्बर, 1573 में भगवंतदास महाराणा को समझाने आए, लेकिन असफल रहे। चौथी बार टोडरमल आए, तब तक प्रताप युद्ध की तैयारी में जुट चुके थे। समझौते में असफलता मिलने पर आग बबुला अकबर ने मानसिंह और आसफ खां को भी युद्ध के लिए भेजा। हल्दीघाटी से प्रारंभ हुए युद्ध में पराजित सेना अजमेर लौट आई। अकबर ने दोनों को दण्डित करते हुए उनकी ड्योढ़ी बंद कर दी थी। सिद्ध होता है कि युद्ध में मुगल सेना की विजय होती तो अकबर उन्हें पुरस्कार करता, न कि सजा देता। डॉ. जमनेश ओझा ने अल बदायूनी की बात स्मरण करते हुए कहा कि मुगल सेना हार चुकी थी। गांजी खां की सेना पर हमले के दौरान सीकरी के शहजादे, गांजी खां और शेख मंसूर वहां से भाग छूटे। सेना वहां से भाग निकली। जब वह मुगल सेना के विजयी की बात करता तो उस पर कोई विश्वास भी नहीं करता। डॉ. के.एस. गुप्ता ने कहा कि प्रताप ने तलवार के एक ही वार से बहललोल खान के शिरसत्राण, जिरह बख्तर व घोड़े सहित चीर दिया। इस घटना ने मुगलों पर प्रभाव डाला, इतना भय व्याप्त हो गया कि मानसिंह दुबारा युद्ध के लिए वापस नहीं आ सका। गुप्ता ने कहा कि हल्दीघाटी युद्ध का अपना एक महत्व है। उसने एक नई दिशा दी है। संचालन परमेनदर दशोरा ने किया।
Published on:
20 Jun 2020 10:18 pm
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