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अपनों का ऐसा दंश कि छली गईं और छिन भी गई ‘गोद’ , रिश्तेदारों ने ही बनाया 10 को कुंवारी मां, लोकलाज में दर्ज भी नहीं मुकदमे

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अपनों का ऐसा दंश कि छली गईं और छिन भी गई ‘गोद’ ,

मोहम्मद इलियास/उदयपुर. अपनों से मिले शारीरिक दंश को नौ माह कच्ची कोख में रख संभाग में कई बच्चियां कुंवारी मां तो बन गई, लेकिन विडम्बना ऐसी कि वह चाहते हुए भी नवजात को अपना नहीं बना सकी। लोकलाज के चलते कुंवारी मांओं के बच्चों को उनके मां-बाप बकायदा विधिक प्रक्रिया अपनाते हुए स्वेच्छा से सरकार के सुपुर्द कर रहे हैं। कारणों में उन्होंने सामाजिक परेशानी का हवाला देकर खूब मजबूरियां गिनाईं लेकिन घृणित कृत्य करने वाले अपने ही होने से उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। बदनामी के चलते बच्चियां मौन हैं और अपराधी उनके घर आंगन में आ जा रहे हैं।
राज्य के दक्षिणांचल के आदिवासी बहुल इलाके में पिछले तीन साल में महज 13 से 16 साल की 10 कुंवारी मां ने अपने बच्चों को सरकार के सुपुर्द कर दिया। अपनों के हाथों ही छली गई इन बच्चियों के मासूमों की सुपुर्दुगी के समय परिजन अपनी इज्जत को रोते हुए सारा आरोप बच्चियों पर मढ़ रहे हैं, ऐसे में बाल कल्याण समिति उन्हें बच्चियों को सहारा देने संबंधित समझाइश कर रही है।

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कई माताओं का मिल रहा इन्हें दूध

महज एक-दो दिन से लेकर 15 दिन के दुधमुंहे मासूमों को राजकीय शिशुगृह में भी विशेष देखभाल के साथ ही उन्हें वहां कई माताओं द्वारा दुग्धपान करवाया जाता रहा है। मदर मिल्क बैंक से मिलने वाले दुग्ध से यह बच्चे पल-बढ़ कर आगे दत्तक ग्रहण के बाद अन्य माताओं की सूनी गोद में चले गए।

पालने के बाद सुपुर्दगी में संभाग आगे
उदयपुर संभाग शुरू से ही कन्या भू्रण हत्याओं के मामलों में बदनाम रहा। इधर-उधर झाडिय़ों, नदी-नालों में मासूमों के जानवरों के लगातार शव मिले तो सरकार ने ‘फेंको मत हमें दो’ के पूरे राज्य में पालने लगाए। इन पालनों में पूरे राजस्थान में सर्वाधिक बच्चे उदयपुर संभाग में ही आए। अब बच्चों की सुपुर्दगी में भी यह संभाग अव्वल हो गया।

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यह है प्रक्रिया
मां-बाप या रिश्तेदारों के साथ मां बच्चे की सुपुर्दगी के लिए सीडब्ल्यूसी के समक्ष पेश होती है। काउंसलिंग के बाद नहीं मानने पर बच्चा राजकीय शिशुगृह भिजवाया जाता है। मां को 60 दिन तक सोचने समझने का समय और देते हैं। दो माह के बाद परिजनों व रिश्तेदारों के साथ बुलाकर फिर काउंसलिंग करते हैं। सुपुर्दगी नहीं लेने पर बच्चे को दस्तावेजों में लीगल फ्री किया जाता है।

कब-कब आए बच्चे
वर्ष 2015-2 बच्चे

2017-4 बच्चे

2018 अब तक 4 बच्चे

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पालने के अलावा संभाग से कई नाबालिग ने अपने बच्चे सुपुर्द किए हैं। लीगल फ्री होने के बाद उन्हें दत्तक ग्रहण में दे दिए गए।

डॉ.प्रीति जैन, बाल कल्याण समिति अध्यक्ष