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धरोहरों का खजाना समेटे है मेवाड़, यहां की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक और कलात्मक धरोहर पूरे विश्व में मशहूर

- यूनेस्को ने दिया है मेवाड़ के दो ऐतिहासिक किलों को वल्र्ड हैरिटेज सूची में स्थान, कोरोना महामारी और लॉकडाउन में हमें पुरानी जड़ों, परंपराओं और धरोहरों को संभालने और सहेजने का देता है सबक

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उदयपुर. विरासतों या धरोहरों की जब बात आती है तो उसमें राजस्थान के मेवाड़ की धरोहरें पूरे विश्व में मशहूर हैं। मेवाड़ के पास हर तरह की धरोहरों का खजाना है। यूनेस्को ने राजस्थान के 6 किलों को ऐतिहासिक धरोहरों का दर्जा दिया है, उसमें से मेवाड़ के दो ऐतिहासिक किले हैं। इतना ही नहीं यहां ना केवल ऐतिहासिक बल्कि सांस्कृतिक, प्राकृतिक और कलात्मक धरोहरें भी हैं। आज पूरी दुनिया कोविड 19 जैसी महामारी से जूझ रही है और लॉकडाउन के कारण लोग घरों में रहने को मजबूर हैं। फिर से एक पुराने दौर में जीने लगे हैं। वहीं, प्रकृति अपने पुराने स्वरूप में लौट रही है। ऐसे में इस वायरस ने हमें अपनी पुरानी जड़ों, परंपराओं, विरासतों को सहेज कर रखने और उनको कायम रखने के लिए एक सबक जरूर दिया है। बस, अब हमें ये प्रण लेना होगा कि इन विरासतों का हर हाल में संरक्षण किया जाए ताकि आने वाली पीढिय़ां भी इसी तरह मेवाड़ की यश गाथाएं गाती रहें। विश्व विरासत दिवस पर रू-ब-रू करा रहें मेवाड़ की विरासतों से-


ऐतिहासिक धरोहरें- अभेद्य दुर्ग से लेकर मंदिर, महल, हवेलियां

मेवाड़ के दो दुर्ग यूनेस्को की सूची में शुमार हैं। इनमें से एक राजसमंद जिले के कुंभलगढ़ दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने सन 13 मई 1459 को कराया था। इस किले को 'अजेयगढ़' कहा जाता था, क्योंकि इस किले पर विजय प्राप्त करना दुष्कर कार्य था। इसके चारों ओर एक बड़ी दीवार बनी हुई है, जो चीन की दीवार के बाद विश्व कि दूसरी सबसे बड़ी दीवार है। इस किले की दीवारें लगभग 36 किमी लम्बी है। इसी तरह, चितौड़ का दुर्ग देश का सबसे बड़े दुर्ग में शामिल है। 7वीं शताब्दी में इसका निर्माण चित्रांगद मौर्य ने कराया था। यह दुर्ग त्याग, वीरता, बलिदान, स्वतंत्रता और स्वाभिमान का प्रतीक है। वहीं इसके अलावा सिटी पैलेस, जगत का सास-बहू मंदिर, एकलिंगनाथ मंदिर, श्रीनाथजी मंदिर, घसियार का मंदिर, बावडिय़ां, हवेलियों के रूप में यहां की विरासतें आज भी जीवंत हैं।

सांस्कृतिक धरोहरें- मेवाड़ के मेले और पर्व

मेवाड़ की सांस्कृतिक धरोहर का सबसे बड़ा उदाहरण फतहसागर की पाल पर हरियाली अमावस्या पर लगने वाला महिलाओं और पुरुषों का मेला है। पूरे विश्व में ये एक अनूठा उदाहरण है जहां एक मेला सिर्फ महिलाओं के लिए लगाया जाता है और वहां सिर्फ महिलाओं को आने की अनुमति होती है। इस मेले में हजारों की संख्या में महिलाएं जुटती हैं। इसी तरह यहां का गणगौर उत्सव है, जिसे मेवाड़ फेस्टिवल के रूप में भी जाना जाता है। चार दिन तक यहां गणगौर उत्सव का नजारा देखने के लिए देशी-विदेशी पर्यटक जुटते हैं।

कलात्मक धरोहरें- यहां की कलाएं और कलाकार

मेवाड़ की हर बात अनूठी है तो यहां की कला और कलाकार भी होंगे ही। यहां की मिनिएचर आर्ट पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है तो यहां की पिछवई पेंटिंग्स के भी चर्चे मशहूर हैं। पिछवई आर्ट मेवाड़ की धार्मिक नगरी नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर से निकलकर दुनिया भर में चली गई। पिछवई कलाकृतियों के प्रमुख विषय श्री कृष्ण और राधा, कृष्ण-गोपियों की रासलीला, राजाओं जलूस और प्रकृति चित्रण होते हैं। वहीं, मिनिएचर आर्ट और कावड़ कला भी उतनी ही पसंद की जाती है। हालांकि अब इनके कलाकार गिने-चुने ही रह गए हैं। ऐसे में जरूरत इन कलाओं को सहेजने की है।

प्राकृतिक धरोहरें- झीलें, नदियां, पहाड़, जंगल हैं प्रकृति का खजाना
राजस्थान में मेवाड़ को प्राकृतिक धरोहरों की देन है। यहां के पहाड़, नदियां, झीलें, जंगल प्रकृति का खजाना हैं। शहर की लाइफ लाइन कही जाने वालीं फतहसागर, पिछोला झील हों या जयसमंद और राजसमंद की झीलें, इन्हीं के ऊपर शहर का पर्यटन निर्भर करता है। खूबसूरत पहाड़ों के बीच से होकर निकलने वाली नदियां और जंगल, जिनमें रहने वाले वन्यजीव और पेड़-पौधे भी इस विरासत के उदाहरण हैं। हमारा कत्र्तव्य है कि जिन झीलों, पहाड़, जंगलों पर हमारा जीवन निर्भर है, उसकी सुंदरता को हम बनाए रखें, उसे नुकसान नहीं पहुंचाएं। तभी ये विरासतें भी संरक्षित रह सकेंगी।

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