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प्रतिक्रिया की बजाए रखेंं समता भाव, मुनिजनों ने जैन धर्म प्रेमियों को प्रवचन देकर अच्छे कार्यों के लिए किया प्रेरित

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National Jain Science Symposium

उदयपुर. महाप्रज्ञ विहार में आचार्य शिव मुनि ने कहा कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समता भाव से कठिनाइयों और कष्टों का सामना करना ही परिचय कहलाता है। ध्यान करते हुए, पूजा पाठ करते हुए, शरीर पर मक्खी या मच्छर बैठ जाए तो प्रतिक्रिया की बजाए समता भाव से उसका सामना करें। उन्होंने कहा कि भूख लगे तो तुरंत ही खाना नहीं खाना चाहिए बल्कि तीव्र भूख की स्थिति में भोजन लेना चाहिए।
आचार्य ने कहा कि जो भी आपकी अभिलाषा है, जो भी आपकी चाहत है। वह सब पूरी भी हो जाती है। तब भी उसमें आपके जीवन का सार नहीं है। आपके जीवन का सार तो समता और साधना में ही है। इससे पूर्व धर्म सभा में शुभम मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र का वाचन करते हुए जीवन में प्रमाद नहीं करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि प्रमादी मनुष्य कभी भी कष्ट आने पर स्वयं की रक्षा स्वयं नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि हम प्रमाद रहित होकर ही जीवन में आगे बढ़ सकते हैं और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
तप तय करता है स्थान
हुमड़ भवन में आयोजित धर्मसभा में मुनि सहस्र सागर ने कहा कि जो तप से तपता है। वह भव से पार हो जाता है। जिस प्रकार स्वर्ण पाषाण पहले तो किदृ कालिका से युक्त होता है। वह 16 ताव तपने के बाद स्वर्ण पर्याय बनता है। उसी प्रकार आत्मा भी पहले पापों से कलुषित होती है। तपन से शुद्ध और निर्मल हो जाती है।
महत्वकांक्षाओं को अंत नहीं
मुनि शास्त्रतिलक विजय ने कहा कि मनुष्य की महात्वाकांक्षाओं का कोई अंत नहीं है। वह एक कार्य होते ही दूसरी सफलता के बारें में सोचने लग जाता है। हिरणमगरी से. 4 स्थित शंातिनाथ जिनालय में आयोजित धर्मसभा में मुनि ने कहा कि जिस प्रकार हर फील्ड में प्रवेश करते ही मनुष्य यह सोचता है की मुझे टॉप पर पहुंचना हैं। यह जानकारी जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जिनालय समिति सेक्टर-4 के अध्यक्ष सुशील कुमार बांठिया ने दी।