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Janmashtmi 2022 : मेवाड़ के घट-घट में बिराजे श्रीनाथजी, यहां का कृष्ण प्रेम अनूठा

Janmashtmi 2022 श्रीनाथजी के चार धाम ने वीरभूमि को बनाया धर्मधरा  

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मधुलिका सिंह/उदयपुर. मेवाड़ मीरां की भक्ति के लिए जाना जाता है। मीरां के मन में श्रीकृष्ण समाए तो मेवाड़ भी कृष्ण भक्त हो गया। फिर जब ब्रज से श्रीनाथजी आए तो वे भी यहीं के होकर रह गए। इससे मेवाड़ की आस्था श्रीनाथजी में प्रबल हो गई। मेवाड़ में ही श्रीनाथजी के चार मंदिर हैं, यहां मुख्य मंदिर नाथद्वारा में श्रीनाथजी विराजमान है, वहीं, उदयपुर और उदयपुर के पास घसियार में और डूंगरपुर में श्रीनाथजी के मंदिर हैं। यानी मेवाड़ का श्रीनाथजी प्रेम अनूठा है। वहीं, मेवाड़ के अन्य कृष्ण मंदिर ऐेसे हैं, जो मथुरा-वृंदावन से किसी भी तरह कम नहीं है। दुनिया भर में इन मंदिरों की ख्याति है, हर देश में इनके भक्त है, वे यहां दर्शन के लिए भी आते हैं।

प्रभु श्रीनाथजी को नर और मादा तोपों से दी जाती है सलामी :

पुष्टिमार्गीय वल्लभ सम्प्रदाय की प्रधानपीठ श्रीनाथद्वारा में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एवं नंद महोत्सव प्रमुखता से मनाया जाता है। यहां प्रभु श्रीकृष्ण के जन्म पर रात 12 बजे नर और मादा तोपों से 21 तोपों की सलामी दी जाती है, तो दूसरे दिन नंद महोत्सव की भी धूम मचती है। ब्रज से श्रीनाथजी को हिंदू मंदिरों के व्यापक विनाश से सुरक्षा के लिए औरंगजेब के दमनकारी शासनकाल के दौरान मेवाड़ लाया गया था । माना जाता है कि यात्रा के दौरान छवि को ले जाने वाला रथ मेवाड़ के सिंहाड़ गांव में मिट्टी में फंस गया था और यहीं श्रीनाथजी की मूर्ति की स्थापना हुई तब से इसे नाथद्वारा कहा जाने लगा।

जब नाथद्वारा पर हुआ आक्रमण तो प्रभु श्रीनाथजी को यहां रखा सुरक्षित :

ईसवाल के पास घसियार में प्रभु श्रीनाथजी का ये अति प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर श्री गोवर्धन धरण प्रभु श्रीनाथजी (नाथद्वारा) का पूर्व निवास स्थल है। बहुत समय पहले पिंडारियों ने नाथद्वारा पर आक्रमण किया था, नाथद्वारा में काफी लोग मारे गए और मंदिर की संपत्ति को उनके द्वारा लूटा जाने लगा था और इससे भगवान श्रीनाथ प्रभु की पूजा और सेवा में विघ्न पडऩे लगा, तब नाथद्वारा मंदिर के गुसाईं जी ने प्रभु जी को अन्यत्र ले जाने का विचार बनाया और घसियार क्षेत्र के बियाबान और दुर्गम स्थान पर किलेनुमा मंदिर का निर्माण कराया।

उदयपुर में भी श्रीनाथजी की हवेली में रहा प्रभु का वास

उदयपुर में भी कुछ समय के लिए श्रीनाथजी का वास रहा था। यहां खेरादीवाड़ा व माहेश्वरी समाज के नोहरे के सामने िस्थत श्रीनाथजी की हवेली में प्रभु को लाया गया था। दरअसल, घसियार मंदिर का निर्माण पूरा होने तक पहले प्रभु को उदयपुर ले जाकर कुछ महीनों तक वहां एक मंदिर में उनकी सेवा व पूजा की। उदयपुर में ये मंदिर श्रीनाथजी की हवेली के नाम से जाना जाता है। उसके बाद मंदिर निर्माण पूरा हो जाने के बाद प्रभु श्रीनाथजी को घसियार मंदिर ले आए। बाद में प्रभु को वापस नाथद्वारा ले गए । इस साल कृष्ण जन्माष्टमी पर यहां वैष्णव जन और श्रद्धालु बड़ी संख्या में प्रभु दर्शनार्थ पधारेंगे।

डूंगरपुर में है भारत की सबसे बड़ी श्रीनाथजी की प्रतिमा

डूंगरपुर में गेपसागर जलाशय की पाल पर श्रीनाथजी के मंदिर में भारत की सबसे बड़ी गोवद्र्धननाथ (श्रीनाथजी) की प्रतिमा स्थापित है। जब ब्रज धाम से वल्लभ संप्रदाय के भक्तजन श्रीनाथजी की प्रतिमा को रथ में विराजित कर सुरक्षित स्थल के लिए निकले थे। उस समय वे डूंगरपुर भी पहुंचे। प्रतिमा डूंगरपुर में स्थापित करने की अनुमति चाही, लेकिन तत्कालीन महारावल के तीर्थांटन पर होने से ऐसा नहीं हो पाया। बाद में श्रीनाथजी की प्रतिमा नाथद्वारा में स्थापित की गई। श्रीनाथजी के डूंगरपुर में कुछ दिन विश्राम करने के निमित्त ही तत्कालीन महाराज पूंजराज (पूंजा) ने गेपसागर की पाल पर श्रीनाथजी मंदिर बनवाया था।