
महाराणा प्रताप की हल्दीघाटी युद्ध में एेतिहासिक विजय हुई थी। इस युद्ध को अब तक अनिर्णित बताना पूरी तरह गलत है। प्रताप इतिहास में स्वाधीनता के अमिट हस्ताक्षर हैं।
यह कहना है मेवाड़ के इतिहासकारों और शिक्षाविदों का। मेवाड़वासी चाहते हैं कि प्रताप की जीत और स्वाभिमान के सम्मान में एक स्मारक बने व पाठयक्रमों में यह सही तथ्य पढ़ाया जाए कि हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप जीते थे। जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ के निर्देशन में हल्दीघाटी युद्ध को लेकर हुआ शोध पूरे देश में चर्चा का विषय बन हुआ है। महाराणा प्रताप की जीत व इस पर शोध संबंधित समाचार को सबसे पहले राजस्थान पत्रिका ने 4 फरवरी के अंक में प्रकाशित किया था। इसके बाद बीओएस ने युद्ध के परिणामों पर कमेटी बनाई। अब प्रदेश सरकार इसे पाठयक्रम में शामिल करवा रही है।
यह मानते इतिहासकार
तत्कालिक परिस्थितियों में हार या जीत का निर्णय राजा को बंदी बनाने या युद्धभूमि में मार गिराने से होता था। मुगल सेना न प्रताप को बंदी बनाया और न ही मार सकी। हकीम खां सूर के नेतृत्व में हुआ प्रताप का आक्रमण इतना जबर्दस्त था कि मुगल सेना को करीब 14 किलो मीटर तक भागकर जान बचानी पड़ी। इस तथ्य को युद्ध में उपस्थित बदायुंनी स्वयं लिखा है। युद्ध में सब प्रकार से प्रताप का ही पलड़ा भारी रहा था। इसके बाद दिवेर में भी प्रताप की एेतिहासिक जीत हुई थी। इसलिए प्रताप की जीत में स्मारक निर्माण बनना चाहिए।
प्रताप सिर्फ मेवाड़ के नहीं, पूरे राष्ट्र के आदर्श हैं
महाराणा प्रताप सिर्फ मेवाड़ के नहीं, पूरे राष्ट्र के आदर्श हैं। प्रताप ने स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर लोकतंत्र की नींव रखी थी। स्वाधीनता का अर्थ भावी पीढ़ी को समझाने के लिए प्रताप की याद में स्मारक बनाना चाहिए।
प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत, कुलपति राजस्थान विद्यापीठ विवि
जीत के समस्त दस्तावेज प्रताप के पक्ष में हैं
हल्दीघाटी युद्ध में प्रताप की जीत हुई थी। जून 1576 के बाद प्रताप में पट्टे जारी किए। जगदीश मंदिर में प्रताप की जीत की प्रशस्ति लगी है। अकबर ने आमेर के राजा मानसिंह को 6 महीने तक दरबार में नहीं आने की सजा दी। जीत के समस्त दस्तावेज प्रताप के पक्ष में हैं। कम सेना के बावजूद प्रताप की जीत से ही हल्दीघाटी देश के इतिहास में अमर हुई।
डॉ. चन्द्रशेखर शर्मा, एमजी कॉलेज
Published on:
24 Feb 2017 12:12 pm
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