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मेडिकल सर्टिफिकेट जांच का सिस्टम नहीं

मेडिकल सर्टिफिकेट जांच का सिस्टम नहीं
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मेडिकल सर्टिफिकेट जांच का सिस्टम नहीं

मेडिकल सर्टिफिकेट जांच का सिस्टम नहीं

भुवनेश पंड्या
फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट प्रस्तुत कर सरकारी सिस्टम में छुट्टियां स्वीकृत करवाना कोई नया काम नहीं है, लेकिन अब ये आम चलन में आ चुका है। बिना किसी बीमारी या समस्या के ये सर्टिफिकेट अवकाश के लिए रामबाण बन चुका है। कुछ पैसे का खर्च और चाहो तब अवकाश। ना तो स्कूलों में इन सर्टिफिकेट की जांच का कोई सिस्टम है और ना ही अन्य विभागों में। खास तौर पर शिक्षा विभाग में तो ये सामान्य बात हो गई है। यहां तक की कोई ये तक देखने वाला नहीं है कि सर्टिफिकेट किसी चिकित्सक ने ही बनाया है या नहीं। मलतब यदि कोई सपाट फर्जी प्रमाण पत्र भी बनाकर दे देगा तो विभाग उसे आसानी से स्वीकार कर ही लेगा।

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स्कूलों में नियम है कि यदि कोई शिक्षक बीमार है तो वह पहले सीकनेस यानी बीमार होने का और बाद में फि टनेस यानी आरोग्य, ठीक होने का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करेगा। लेकिन आम तौर पर इन नियमों का पालन नहीं हो रहा। इतना ही नहीं स्कूलों में धडल्ले से अवकाश के लिए मेडिकल सर्टिफिकेट लगाए जाते है और बगैर जांचे परखे उन्हें स्वीकार भी किया जाता है। लेकिन कायदों को तोडऩे वाले ऐसे कार्मिकों का सरकार के पास कोई तोड़ नहीं।

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ये है सबसे महत्वपूर्ण - - यदि कोई शिक्षक स्वयं को बीमार बता रहा है और संस्थाप्रधान को ये बात गले नहीं उतर रहीं तो वह तीन सदस्यीय मेडिकल बोर्ड बिठाकर बकायदा उसकी जांच करवा सकता है, जांच के बाद उसकी रिपोर्ट ही मान्य मानी जाती है, लेकिन ऐसे शायद ही वर्षों में कोई गिने-चुने उदाहरण भी शिक्षा विभाग के पास नहीं है। - शिक्षा विभाग में वर्ष भर में 15 सीएल यानी आकस्मिक अवकाश और 15 पीएल यानी उपार्जित अवकाश मिलते है। यदि कोई अवकाश नहीं लेता है, तो उसका केश पैसा उसे हर वर्ष नकदीकरण मलतब वह पैसा शिक्षा विभाग से केश ले सकता है। दूसरी ओर प्रति वर्ष दस अवकाश मेडिकल मिलते है, यह मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर मिलता है। जबकि यदि कोई अद्र्ध वेतन पर रहता है तो वह 20 दिन का अवकाश ले सकता है। यदि किसी को मेडिकल अवकाश बढ़ाने है तो पुराने बकाया अवकाश का इस्तेमाल किया जा सकता है।

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ऐसे जारी होते है सर्टिफिकेट: एलोपैथिक चिकित्सक- 15 दिन प्रोफेसर - 30 दिन आयुर्वेदिक चिकित्सक- 30 दिनमेडिकल बोर्ड- इससे अधिक अवकाश पर

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-नियम तो पहले सीकनेस व बात में फिटनेस देने का है, जरूरत पर बोर्ड बिठाया जाता है, स्कूलों में इसकी पालना करनी ही चाहिए। यदि कहीं कोई शिकायत होती है तो जांच करवा सकते है, अन्यथा सर्टिफिकेट जांच करवाने का तो कोई सिस्टम नहीं किया गया है। पुष्पेन्द्र शर्मा, मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी उदयपुर

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यदि कोई चिकित्सक गलत तरीके से सर्टिफिकेट पैसा लेकर बना रहा है तो ये अपराध है, मामले की जानकारी मिलने पर तत्काल कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

डॉ दिनेश खराड़ी, सीएमएचओ उदयपुर